गाय-भैंस को थनैला रोग हुआ तो घटेगा दूध! जानिए लक्षण और बचाव के तरीके, वजह जानकर हो जाएंगे हैरान – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: दुधारू गाय और भैंस में थनैला रोग पशुपालकों के लिए बड़ी परेशानी बन सकता है. इस बीमारी के कारण पशु के थन में सूजन, दर्द और संक्रमण की समस्या होती है, जिससे दूध का उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. समय पर बीमारी की पहचान और उचित उपचार नहीं मिलने पर थन के ऊतकों को स्थायी नुकसान भी पहुंच सकता है. ऐसे में पशुपालकों के लिए जरूरी है कि वे दूध निकालते समय पशु के थन और दूध में होने वाले बदलावों पर ध्यान दें. कृषि विज्ञान केंद्र, नोएडा के पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, थनैला रोग से बचाव के लिए साफ-सफाई, दूध निकालने के सही तरीके और शुरुआती लक्षणों की पहचान पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

थनैला रोग  को मैस्टाइटिस (Mastitis) भी कहा जाता है. यह मुख्य रूप से थन में होने वाला संक्रमण और सूजन है, जो अक्सर बैक्टीरिया के कारण होता है. दूध निकालते समय साफ-सफाई की कमी, गंदे वातावरण में पशु का रहना और थन की उचित देखभाल नहीं होना संक्रमण का खतरा बढ़ा सकता है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, दुधारू पशुओं में इस बीमारी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. थनैला रोग का असर केवल दूध की मात्रा पर ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी पड़ता है. गंभीर स्थिति में पशु के थन के ऊतकों को नुकसान हो सकता है. इससे पशुपालक की आमदनी प्रभावित होने के साथ पशु के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है.

पशुपालकों को रोज दूध निकालते समय  गाय या भैंस के थन की जांच करनी चाहिए. थन में सूजन, गर्माहट, लालिमा और छूने पर दर्द होना इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हो सकते हैं. इसके अलावा दूध में फटे हुए कण, थक्के, खून या पानी जैसी असामान्य बनावट दिखाई दे सकती है. बीमारी बढ़ने पर दूध उत्पादन में कमी आने लगती है. गंभीर संक्रमण की स्थिति में पशु को बुखार हो सकता है, वह खाना कम कर सकता है और सुस्त दिखाई दे सकता है. पशु चिकित्सक के मुताबिक, इन लक्षणों को सामान्य समस्या समझकर टालना नुकसानदायक हो सकता है. यदि थन या दूध में असामान्य बदलाव नजर आएं, तो जल्द से जल्द पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. समय पर जांच होने से बीमारी की गंभीरता कम करने और पशु को उचित उपचार देने में मदद मिलती है.

थनैला रोग से बचाव में स्वच्छता की अहम भूमिका होती है. पशुपालकों को दूध निकालने से पहले और बाद में हाथ अच्छी तरह साफ करने चाहिए. थन को साफ करके सुखाने के बाद ही दूध निकालना चाहिए. पशु के बैठने की जगह साफ और सूखी रखें, ताकि थन गंदगी और गोबर के संपर्क  में कम आए. दूध निकालने के बाद थन के सिरे की स्वच्छता बनाए रखना भी जरूरी है. इसके लिए पशु चिकित्सक की सलाह से उपयुक्त टीट-डिपिंग उत्पाद का इस्तेमाल किया जा सकता है. पशु के बिछावन और गोशाला की नियमित सफाई करें. यदि किसी पशु में थनैला रोग के लक्षण दिखें, तो उसकी जांच कराएं और जरूरत पड़ने पर उसे अन्य दुधारू पशुओं से अलग रखें.

ग्रामीण क्षेत्रों में थनैला रोग के लिए गर्म पानी से सिकाई, हल्दी या एलोवेरा का लेप लगाने जैसे घरेलू नुस्खे प्रचलित हैं. हालांकि, इन उपायों से संक्रमण ठीक होने का भरोसेमंद वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. गलत तरीके से सिकाई या लेप लगाने से थन में जलन और संक्रमण बढ़ने का खतरा  हो सकता है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, थनैला रोग का इलाज उसकी गंभीरता और संक्रमण के कारण पर निर्भर करता है. जरूरत पड़ने पर दूध के नमूने की जांच कराकर उचित दवा दी जाती है. एंटीबायोटिक का इस्तेमाल केवल पशु चिकित्सक की सलाह से करना चाहिए. नींबू, काली मिर्च या घी जैसे घरेलू मिश्रण खिलाना भी इस बीमारी का प्रमाणित इलाज नहीं है.

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