एग्रीवेट: 10 अक्टूबर 2026, कोहिमा: सोयाबीन की पत्तियों पर सूंडी का हमला, नागालैंड में वैज्ञानिकों ने बताई नीम तेल और स्पिनोसैड की मात्रा – धान के साथ-साथ नागालैंड में सोयाबीन की फसल पर भी कीट का खतरा मंडरा रहा है। अक्टूबर महीने के लिए जारी मौसम आधारित कृषि सलाह में बताया गया है कि सोयाबीन के पौधों पर सूंडी पत्तियों को जाल जैसा बनाकर उनकी ऊपरी सतह खुरच कर खाती हैं, जिससे पौधे की बढ़वार रुक जाती है।
वैज्ञानिकों ने शुरुआती प्रकोप में जैविक उपाय अपनाने की सलाह दी है। इसके लिए 5 प्रतिशत नीम बीज के अर्क यानी एनएसकेई का छिड़काव किया जा सकता है, या फिर एक लीटर पानी में 2 मिलीलीटर नीम तेल मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। एनएसकेई की ठीक मात्रा सलाह में नहीं बताई गई है, लेकिन इसे आमतौर पर पत्तियों पर अच्छी तरह भीगने तक छिड़का जाता है।
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि सूंडी कीट सबसे ज्यादा नुकसान तब पहुंचाता है, जब सोयाबीन का पौधा फूल और फली बनने की अवस्था में होता है। इस समय पत्तियों का नुकसान सीधे उपज पर असर डालता है, इसलिए किसानों को इस अवधि में खेत का निरीक्षण और बढ़ा देना चाहिए। पत्तियों के नीचे की सतह पर अंडे और छोटे लार्वा दिखने पर ही समय रहते कदम उठाना फायदेमंद रहता है।
यदि सूंडी की संख्या ज्यादा हो जाए और जैविक उपाय से राहत न मिले, तो वैज्ञानिकों ने स्पिनोसैड 45 एससी का 0.75 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी है। सलाह में यह भी कहा गया है कि छिड़काव से पहले खेत के कई हिस्सों में पौधों की जांच कर लेनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि प्रकोप सच में आर्थिक नुकसान पहुंचाने के स्तर तक पहुंचा है या नहीं।
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक अक्टूबर में बादल छाए रहने और नमी ज्यादा रहने की स्थिति में ऐसे सूंडी कीटों का प्रकोप तेजी से फैल सकता है। इसी एडवाइजरी में आम के बागों में मीलीबग कीट को लेकर भी किसानों को सचेत किया गया है, जिसके लिए बाग में पानी भरकर गहरी जुताई करने की सलाह दी गई है। साथ ही गोभी वर्गीय सब्जियों में डैम्पिंग ऑफ, डाउनी मिल्ड्यू, अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट और ब्लैक रॉट जैसी बीमारियों पर भी नजर रखने को कहा गया है, हालांकि इनके लिए फफूंदनाशक का इस्तेमाल तभी करने की सलाह है जब बीमारी वास्तव में फैलने लगे।
किसानों से कहा गया है कि वे अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सही सलाह लें, क्योंकि अलग-अलग इलाकों में कीट का असर अलग-अलग हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने किसानों को यह भी समझाया कि किसी भी कीटनाशक का छिड़काव करने से पहले खेत के अलग-अलग कोनों में पौधों की जांच जरूरी है, ताकि यह साफ हो सके कि प्रकोप वास्तव में कितना फैला है। अगर कुछ ही पौधों पर सूंडी दिख रही है, तो जैविक उपाय से ही काम चल जाता है और रासायनिक छिड़काव टाला जा सकता है। इससे न सिर्फ लागत बचती है, बल्कि मित्र कीटों और मिट्टी की सेहत पर भी कम असर पड़ता है। सलाह में यह भी बताया गया है कि छिड़काव हमेशा सुबह या शाम के वक्त करना बेहतर रहता है, जब तेज धूप नहीं होती और दवा का असर ज्यादा देर तक बना रहता है।