सोयाबीन कटाई के बाद नरवाई नहीं जलाएं किसान, पर्यावरण और मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बचाएं, वजह जानकर हो जाएंगे हैरान – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 08 अक्टूबर 2026, इंदौर: सोयाबीन कटाई के बाद नरवाई नहीं जलाएं किसान, पर्यावरण और मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बचाएं – इंदौर जिले में सोयाबीन फसल की कटाई का कार्य प्रारंभ हो गया है। सोयाबीन की कटाई के पश्चात खेतों में बचे फसल अवशेष (नरवाई) को जलाने की प्रवृत्ति से पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ मिट्टी की संरचना एवं उर्वरा शक्ति भी प्रभावित होती है। नरवाई जलाना खेती के लिए नुकसानदायक होने के साथ ही पर्यावरण एवं जन-धन की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है। जिला प्रशासन, किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग एवं कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा किसानों से नरवाई नहीं जलाने की अपील की गई है।

फसल अवशेष प्रबंधन के संबंध में जिले के समस्त विकासखण्डों की प्रत्येक ग्राम पंचायत मुख्यालय पर कृषि विभाग के मैदानी अधिकारियों, राजस्व विभाग के पटवारी एवं पंचायत विभाग के पंचायत सचिव के माध्यम से किसानों को नरवाई जलाने से होने वाले नुकसान तथा इसके उचित प्रबंधन के उपायों की जानकारी दी जाएगी।

नरवाई जलाने पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि का प्रावधान – मध्यप्रदेश शासन के प्रावधानों के अनुसार नरवाई जलाने पर पर्यावरण क्षति के रूप में आर्थिक दण्ड का प्रावधान निर्धारित किया गया है। इसके तहत 2 एकड़ तक भूमि वाले व्यक्ति, निकाय अथवा कृषक द्वारा नरवाई जलाने पर प्रति घटना 2 हजार 500 रुपये, 2 से 5 एकड़ तक भूमि वाले कृषक द्वारा नरवाई जलाने पर प्रति घटना 5 हजार रुपये तथा 5 एकड़ से अधिक भूमि वाले कृषक द्वारा नरवाई जलाने पर प्रति घटना 15 हजार रुपये पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि के रूप में आर्थिक दण्ड निर्धारित है। नरवाई में आग लगाने पर पुलिस द्वारा प्रकरण भी कायम किया जा सकता है।

नरवाई जलाने से मिट्टी एवं पर्यावरण को नुकसान – सोयाबीन एवं अन्य फसलों के अवशेषों को जलाने से भूमि में मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु एवं केंचुए नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। लगातार नरवाई जलाने से भूमि कठोर होने के साथ उसकी जल धारण क्षमता भी कम होती है। इसके अलावा खेतों के आसपास खड़ी फसलों में आग फैलने से जन-धन की हानि की आशंका रहती है। नरवाई जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है तथा वातावरण के तापमान में वृद्धि होने से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

नरवाई प्रबंधन के अपनाएं वैज्ञानिक उपाय –  किसान भाई नरवाई जलाने के बजाय इसके उचित प्रबंधन के लिए स्ट्रॉ रीपर (भूसा मशीन) से भूसा तैयार कर सकते हैं। वेलर मशीन के माध्यम से फसल अवशेषों की बेल बनाकर कागज उद्योग, बायोमास तथा डेयरी में उपयोग किया जा सकता है। मल्चर मशीन से फसल अवशेषों को बारीक काटकर खेत में जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसी प्रकार कम्बाइन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम वाले हार्वेस्टर का उपयोग करने की सलाह दी गई है। खेत में कल्टीवेटर, रोटावेटर अथवा डिस्क हैरो आदि कृषि यंत्रों की सहायता से फसल अवशेषों को भूमि में मिलाने से आगामी फसल के लिए आवश्यक जीवांश एवं पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। इससे मिट्टी की संरचना एवं उर्वरा शक्ति को बनाए रखने में मदद मिलती है। फसल अवशेषों का उपयोग पशुओं के लिए भूसा तैयार करने में भी किया जा सकता है।

नरवाई का उचित प्रबंध कर अतिरिक्त आय भी प्राप्त कर सकते हैं किसान –  जिला प्रशासन एवं संबंधित विभागों ने किसानों से अपील की है कि फसल कटाई के पश्चात नरवाई में किसी भी स्थिति में आग न लगायें। नरवाई का उचित प्रबंध कर पशुओं के लिए भूसा, खेत के लिए जैविक खाद एवं अन्य उपयोगी सामग्री तैयार की जा सकती है। इससे भूमि एवं पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाने के साथ ही फसल उत्पादन के अतिरिक्त आय के अवसर भी प्राप्त किए जा सकते हैं। किसानों से अपील की गई है कि वे स्वयं नरवाई न जलाएं तथा अन्य किसानों को भी इसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करें।

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