एग्रीवेट: 08 अक्टूबर 2026, खंडवा: निमाड़ में बीटी कपास पर गुलाबी सुंडी का प्रकोप, आठ बार छिड़काव के बाद भी राहत नहीं – निमाड़ क्षेत्र के कपास किसान इस सीजन गुलाबी सुंडी के प्रकोप से बुरी तरह परेशान हैं। खरगोन, बड़वानी, खंडवा और बुरहानपुर जिलों में किसानों का कहना है कि बीटी कपास की फसल पर भी यह कीट असर दिखा रहा है, जिसकी वजह से उन्हें एक सीजन में छह से आठ बार तक दवा का छिड़काव करना पड़ रहा है।
किसानों के मुताबिक यह स्थिति तब है जबकि बीटी कपास को शुरू में इस तरह के कीटों से बचाव के लिए ही विकसित किया गया था। बार-बार छिड़काव के बावजूद सुंडी का असर पूरी तरह नहीं थम रहा, जिससे उत्पादन पर भी असर पड़ने की शिकायतें मिल रही हैं।
भगवंतराव कृषि महाविद्यालय के पूर्व वरिष्ठ कपास वैज्ञानिक सतीश पारसाई ने इस समस्या पर कहा कि बीटी कपास को खासतौर पर कीट नियंत्रण के लिए ही तैयार किया गया था। उनके मुताबिक अगर किसानों को अब भी आठ बार छिड़काव की जरूरत पड़ रही है, तो इसका मतलब है कि सिफारिश की गई खेती तकनीकों का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा।
बार-बार कीटनाशक के इस्तेमाल से खेती की लागत भी लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों का मुनाफा घट रहा है। इसके साथ ही खेतों में फायदेमंद कीटों, बिच्छू और पक्षियों की संख्या में भी कमी देखी गई है, जो दवाओं के ज्यादा इस्तेमाल का एक और असर माना जा रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (सीआईसीआर) की सामान्य सलाह के मुताबिक गुलाबी सुंडी के शुरुआती प्रकोप में क्विनालफॉस या थायोडिकार्ब जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। अक्टूबर के बाद खेत में नुकसान का स्तर आर्थिक सीमा तक पहुंचने पर ही सिंथेटिक पायरेथ्रॉइड समूह की दवाओं के छिड़काव की सलाह दी जाती है।
संस्थान यह भी आगाह करता है कि नवंबर से पहले पायरेथ्रॉइड दवाओं का छिड़काव या किसी भी तरह के कीटनाशक मिश्रण का इस्तेमाल सख्ती से टाला जाना चाहिए, क्योंकि इससे सफेद मक्खी जैसे दूसरे कीटों का प्रकोप बढ़ने का खतरा रहता है। कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि छिड़काव से पहले खेत में कीट के नुकसान के स्तर का आकलन जरूर करें और सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही दवा का इस्तेमाल करें।
निमाड़ क्षेत्र में कपास की खेती लंबे समय से किसानों की आय का बड़ा जरिया रही है, इसलिए गुलाबी सुंडी का यह प्रकोप इलाके के कृषि अर्थतंत्र के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। किसान संगठनों का कहना है कि कीट प्रतिरोधी नई किस्मों और समय पर सही सलाह के बिना आने वाले सीजन में भी यह समस्या बनी रह सकती है।
कपास कारोबार से जुड़े व्यापारियों का भी कहना है कि गुलाबी सुंडी की वजह से रेशे की गुणवत्ता पर असर पड़ने से मंडियों में किसानों को कई बार उम्मीद से कम दाम मिल रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञ सामूहिक रूप से कीट प्रबंधन करने की सलाह दे रहे हैं, ताकि आसपास के खेतों से भी सुंडी का प्रकोप खत्म हो सके।
मौजूदा बीटी किस्मों की क्षमता पर सवाल उठने से किसानों का भरोसा कमजोर पड़ता जा रहा है, जिसका असर आने वाले सीजन में इलाके के कपास के रकबे पर भी पड़ सकता है। कृषि वैज्ञानिक इसे नई और ज्यादा कीट प्रतिरोधी किस्मों की जरूरत के तौर पर देख रहे हैं।