एग्रीवेट: Fertilizer Subsidy: देश में रबी सीजन की तैयारी के बीच खाद के इस्तेमाल को लेकर एक बड़ा बदलाव सामने आया है. खरीफ 2026 में सरकार ने फ्रेमवर्क फॉर फर्टिलाइजर्स सेल्स (FFS) का पायलट प्रोजेक्ट 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 222 जिलों में लागू किया था. इसके तहत किसानों को उनकी जमीन और चुनी गई फसल के हिसाब से सब्सिडी वाली खाद खरीदने की सुविधा दी गई. खास बात यह रही कि इन जिलों में खाद खरीदने वाले किसानों की संख्या बढ़ी, लेकिन खाद की कुल बिक्री में करीब 28 फीसदी की कमी आई. इससे सरकार को करीब 1,470 करोड़ रुपये की बचत हुई.
आंकड़ों के मुताबिक, खरीफ 2026 में पायलट वाले जिलों में करीब 46.97 लाख किसानों ने खाद खरीदी. पिछले साल इसी दौरान यह संख्या 44.55 लाख थी. यानी किसानों की संख्या बढ़ी. इसके बावजूद खाद की बिक्री 18.30 लाख टन से घटकर 13.35 लाख टन रह गई. यानी करीब 28 फीसदी की कमी आई. सरकार के मुताबिक, इसका एक कारण यह भी है कि अब खाद की बिक्री को जमीन और फसल से जोड़कर नियंत्रित किया जा रहा है.
हाल ही में हुई वार्षिक रबी कॉन्फ्रेंस में कृषि मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव प्रमोद कुमार मेहरदा की ओर से दी गई जानकारी में बताया गया कि, कई बड़े कृषि उत्पादक राज्यों में खाद की बिक्री काफी कम हुई है. तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में कुछ जगहों पर बिक्री में 75 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई. विशेषज्ञों के मुताबिक, कुछ राज्यों में कम बारिश का असर भी खाद की मांग पर पड़ा. बारिश कम होने से कई जगह फसलों की बुवाई और खेती का काम प्रभावित हुआ, जिससे खाद की जरूरत भी कम हुई.
इस व्यवस्था में खाद की बिक्री को ऐप और ऑनलाइन सिस्टम से जोड़ा गया है. किसान की जमीन और फसल की जानकारी के आधार पर खाद खरीद की सीमा तय होती है. इसके बाद किसान को खाद लेने के लिए टोकन दिया जाता है. इसका एक फायदा यह भी बताया गया कि खाद की दुकानों के बाहर पहले जैसी लंबी लाइनें कम हुईं. किसान को पहले से पता रहता है कि उसे खाद लेने के लिए कब पहुंचना है. पायलट में करीब 77 फीसदी किसानों के पास डिजिटल Farmer ID थी, जबकि करीब 15 फीसदी किसान बटाई या किराये की जमीन पर खेती करने वाले थे.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, इस पायलट प्रोजेक्ट में पंजाब शामिल नहीं था, जबकि मध्य प्रदेश ने किसानों के विरोध के बाद इसे बंद कर दिया. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि इस व्यवस्था को लागू करना राज्यों के लिए अनिवार्य नहीं है. हालांकि, उनका कहना है कि रासायनिक खाद के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को कम करना जरूरी है. इससे मिट्टी की सेहत बचाने के साथ-साथ सब्सिडी वाली खाद के गैर-कृषि इस्तेमाल को भी रोकने में मदद मिल सकती है.
खाद की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ोतरी का असर केंद्र सरकार के खर्च पर भी पड़ रहा है. खाद सचिव रजत कुमार मिश्रा ने राज्यों से अपील की है कि किसान मिट्टी की जरूरत के हिसाब से संतुलित मात्रा में खाद इस्तेमाल करें और जैविक व प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा दिया जाए. उन्होंने बताया कि 1 अक्टूबर को देश में खाद का शुरुआती स्टॉक पिछले तीन साल में सबसे ज्यादा रहने की उम्मीद है. लेकिन वैश्विक कीमतें बढ़ने के कारण चालू वित्त वर्ष में खाद सब्सिडी का खर्च 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जा सकता है.
यूरिया की 45 किलो बोरी पर सरकार की सब्सिडी का बोझ युद्ध से पहले 1,350 रुपये था, जो अब बढ़कर 2,775 रुपये हो गया है. वहीं 50 किलो DAP पर सब्सिडी 2,102 रुपये से बढ़कर 3,523 रुपये हो गई है. ऐसे में सरकार अब खाद की बर्बादी और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को रोकने पर ज्यादा जोर दे रही है.