एग्रीवेट: 04 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: ICAR और FCI ने अनाज भंडारण में कीट नियंत्रण के लिए मिलाया हाथ – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने देश के गेहूं और चावल के भंडार को कीटों से बचाने के लिए सुरक्षित और टिकाऊ तरीके विकसित करने का समझौता ज्ञापन (MoU) किया है। समझौते पर 30 सितंबर को हस्ताक्षर हुए और इसकी जानकारी 1 अक्टूबर को सार्वजनिक की गई।
इस फैसले के पीछे एक गंभीर चिंता है। बरसों से अनाज भंडारण में इस्तेमाल होने वाले परंपरागत फ्यूमिगेशन रसायनों, जैसे एल्युमिनियम फॉस्फाइड और मैलाथियान, के खिलाफ भंडारण कीटों में प्रतिरोध देश के कुछ प्रमुख राज्यों में 72 से 100 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यानी ये दवाएं अब बड़ी मात्रा में कीटों पर असर नहीं कर पा रही हैं।
समझौते पर ICAR की ओर से केंद्रीय कटाई-उपरांत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-CIPHET), लुधियाना के निदेशक डॉ. नचिकेत कोटवालीवाले और FCI की ओर से कार्यकारी निदेशक डॉ. ए.के. सिन्हा ने हस्ताक्षर किए। इस मौके पर कृषि शोध एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट भी मौजूद रहे। उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय का खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग भी इस काम में भागीदार है।
देश में हर साल किसानों से खरीदा गया लाखों टन गेहूं और चावल FCI के गोदामों में महीनों तक रखा जाता है। भंडारण के दौरान कीट लगने से अनाज की गुणवत्ता गिरती है और एक हिस्सा पूरी तरह बर्बाद भी हो जाता है। जब वही पुराने रसायन कीटों पर बेअसर होने लगते हैं, तो नुकसान का खतरा और बढ़ जाता है, और यही कारण है कि दोनों संस्थानों ने अब नए विकल्पों की तरफ रुख किया है।
समझौते के तहत चार नई तकनीकों पर काम होगा। धातु के साइलो में रखे गेहूं के लिए 99 प्रतिशत से अधिक शुद्धता वाली नाइट्रोजन गैस का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे कीटों को सांस लेने के लिए ऑक्सीजन नहीं मिलेगी और वे अपने आप खत्म हो जाएंगे।
बोरियों में रखे गेहूं और चावल के लिए कार्बन डाइऑक्साइड और फॉस्फीन के संयोजन का परीक्षण होगा। हर्मेटिक यानी पूरी तरह हवा-रोधी कवर में बंद अनाज के लिए सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल किया जाएगा।
ये सभी तरीके पारंपरिक जहरीले फ्यूमिगेंट्स की तुलना में अनाज में रासायनिक अवशेष छोड़ने की आशंका कम रखते हैं। गैस आधारित इन तरीकों में कीटों को ऑक्सीजन या अनुकूल वातावरण से वंचित करके ही नियंत्रित किया जाता है, जिससे अनाज की गुणवत्ता पर असर कम पड़ने की उम्मीद जताई गई है।
पूरी परियोजना दो चरणों में बंटी है। पहले चरण में दो साल तक ICAR-CIPHET तीन मुख्य परीक्षण करेगा, जिसमें हर तकनीक की प्रभावशीलता, लागत और अनाज की गुणवत्ता पर पड़ने वाले असर को बारीकी से परखा जाएगा।
दूसरे चरण में एक साल के भीतर देश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बहु-स्थान परीक्षण होंगे, ताकि हर क्षेत्र की गर्मी, नमी और भंडारण ढांचे के हिसाब से अलग मानक प्रक्रिया (SOP) तैयार की जा सके। पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े अनाज उत्पादक राज्यों के गोदाम इन परीक्षणों के लिए खासतौर पर अहम माने जा रहे हैं।
नतीजे सामने आने के बाद ही तय होगा कि FCI के गोदामों में इन तकनीकों को किस स्तर पर और कितनी तेजी से लागू किया जाएगा। अधिकारियों के मुताबिक अगर परीक्षण सफल रहे तो आने वाले वर्षों में देशभर के बड़े सरकारी गोदामों में धीरे-धीरे इन्हें अपनाया जा सकता है, जिससे किसानों से खरीदे गए अनाज की बर्बादी घटाने में मदद मिलेगी।
भंडारण में अनाज की गुणवत्ता बनी रहना किसानों के लिए भी सीधे मायने रखता है। जब सरकार एमएसपी पर गेहूं-चावल खरीदती है, तो खरीद के बाद भी उसकी गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी भंडारण एजेंसियों की ही होती है, और कीट लगने से अगर अनाज खराब होता है तो यह पूरी खरीद-व्यवस्था पर असर डालता है। इसी वजह से कृषि वैज्ञानिक और नीति-निर्माता भंडारण के दौरान कीट प्रबंधन को खेत में फसल सुरक्षा जितना ही अहम मानते हैं।
ICAR-CIPHET पहले से कटाई के बाद की तकनीकों पर काम करने वाला देश का प्रमुख संस्थान है, और इस समझौते के बाद उसकी भूमिका और बढ़ जाएगी। आने वाले महीनों में संस्थान की टीमें अलग-अलग राज्यों के FCI गोदामों का दौरा कर मौजूदा भंडारण ढांचे का आकलन भी करेंगी।