महाराष्ट्र फिर बना देश का शुगर किंग, पर पानी की कमी और बढ़ते गन्ने के रकबे ने बढ़ाई चिंता—जानें पूरा मामला – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: महाराष्ट्र एक बार फिर देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य बन गया है. 2025-26 सीजन में राज्य में 1,044.21 लाख टन गन्ने की पेराई हुई और 99.20 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ. इस मामले में महाराष्ट्र ने उत्तर प्रदेश को पीछे छोड़ दिया. उत्तर प्रदेश में करीब 89 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ. हालांकि, पिछले पांच सीजन के आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र के चीनी उत्पादन में काफी उतार-चढ़ाव रहा है. 2021-22 में राज्य में रिकॉर्ड 137.28 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था. इसके बाद 2024-25 में सूखे के दौरान उत्पादन घटकर 80.76 लाख टन रह गया. 2025-26 में उत्पादन फिर बढ़ा और 99.20 लाख टन पहुंच गया.

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र में चीनी उत्पादन हर साल होने वाला उतार-चढ़ाव मॉनसून और पानी की उपलब्धता से जुड़ा है. राज्य के कुल खेती वाले क्षेत्र में गन्ने की हिस्सेदारी अब करीब 5-6 फीसदी है, जो एक दशक पहले करीब 4 फीसदी थी. CACP और ICRIER के आकलन के मुताबिक, सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी का करीब 60-70 फीसदी गन्ने की खेती में खर्च होता है. गन्ने की खेती का बड़ा हिस्सा सूखे और पानी की कमी वाले इलाकों में है. अकेले मराठवाड़ा में राज्य के करीब एक चौथाई गन्ने का रकबा है. लातूर और धाराशिव जैसे जिलों में बार-बार पानी की कमी की स्थिति बनती है. इसके अलावा, राज्य में सिर्फ करीब 35 फीसदी गन्ने के रकबे में ड्रिप जैसी पानी बचाने वाली माइक्रो-इरिगेशन तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है.

अच्छी बारिश वाले साल में महाराष्ट्र में गन्ने की बंपर फसल होती है और चीनी मिलें लंबे समय तक चलती हैं. लेकिन बारिश कम होते ही इसका असर पूरी चीनी इंडस्ट्री पर पड़ता है. कम बारिश से गन्ने की पैदावार घटती है और चीनी की रिकवरी भी कम हो जाती है. इससे बिजली बनाने के लिए मिलने वाला बगास और एथेनॉल बनाने के लिए जरूरी बी-हेवी शीरा व सिरप भी कम हो जाता है. इसके अलावा चीनी मिलों का पेराई सीजन भी छोटा हो जाता है. 2024-25 में महाराष्ट्र की चीनी मिलें करीब 90 दिन ही चलीं, जबकि सामान्य तौर पर पेराई का सीजन 130-150 दिन का रहता है. इसका असर मिलों की कमाई और किसानों को समय पर गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) भुगतान करने की क्षमता पर भी पड़ता है. ऐसे में महाराष्ट्र की चीनी इंडस्ट्री के सामने अब सिर्फ उत्पादन बढ़ाने की चुनौती नहीं है. पानी का बेहतर और कम इस्तेमाल करते हुए गन्ने की खेती को टिकाऊ बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बन गया है.

महाराष्ट्र में गन्ने की पैदावार और चीनी उत्पादन में पिछले पांच सालों के दौरान काफी बदलाव देखने को मिला है. 2021-22 के रिकॉर्ड सीजन में गन्ने की औसत पैदावार करीब 90 टन प्रति हेक्टेयर रही. इस दौरान चीनी मिलों ने 1,320.31 लाख टन गन्ने की पेराई की और रिकॉर्ड 137.28 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ. मिलें औसतन 173 दिन चलीं. इसके उलट, 2024-25 के भीषण सूखे में गन्ने की औसत पैदावार घटकर करीब 78 टन प्रति हेक्टेयर रह गई. इस वजह से कुल गन्ना पेराई घटकर 852.34 लाख टन और चीनी उत्पादन 80.76 लाख टन रह गया. 2025-26 में चीनी उत्पादन बढ़कर 99.20 लाख टन हो गया. इस दौरान 1,044.21 लाख टन गन्ने की पेराई हुई. उत्पादन बढ़ने की एक बड़ी वजह गन्ने के रकबे में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी रही. गन्ने का रकबा 13.7 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 16.4 लाख हेक्टेयर हो गया. अच्छी बारिश ने भी उत्पादन बढ़ाने में मदद की.

महाराष्ट्र में 200 से ज्यादा चीनी मिलें हैं. इनकी कुल रोजाना गन्ना पेराई क्षमता करीब 9.5 लाख टन है. अगर मिलें 160 दिनों की बेहतर अवधि तक पूरी क्षमता से चलें, तो उन्हें सालाना करीब 1,520 लाख टन गन्ने की जरूरत होगी. लेकिन राज्य में वास्तविक गन्ने की उपलब्धता इससे काफी कम है. 2021-22 जैसे रिकॉर्ड सीजन में भी मिलों को अपनी अनुमानित जरूरत का करीब 87 फीसदी ही गन्ना मिल पाया था. वहीं, 2024-25 के सूखे में यह आंकड़ा घटकर करीब 56 फीसदी रह गया. इन आंकड़ों से पता चलता है कि महाराष्ट्र की चीनी मिलों की क्षमता और उपलब्ध गन्ने के बीच बड़ा अंतर है. उत्पादन बढ़ाने के लिए हर साल गन्ने का रकबा बढ़ाना लंबे समय में पानी और खेती पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है.

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