एग्रीवेट: 02 अक्टूबर 2026, जयपुर: सिंचाई जल उपलब्धता की कमीः किसान करें कम पानी वाली सरसों, चना, जौ की बिजाई – खरीफ सीजन में कम बारिश और बांधों के जल स्तर में गिरावट के बीच रबी फसलों के लिए सिंचाई जल की उपलब्धता कम रहने की संभावना है। ऐसे में राजस्थान कृषि विभाग ने किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने के साथ कम पानी में तैयार होने वाली सरसों, चना और जौ की जलवायु अनुकूल किस्मों की खेती करने की सलाह दी है।
श्रीगंगानगर जिले के कृषि (विस्तार) संयुक्त निदेशक डॉ. सतीश शर्मा ने बताया कि किसानों को फसल विविधीकरण के साथ कम पानी में तैयार होने वाली सरसों, चना और जौ की जलवायु अनुकूल किस्मों का चयन करना चाहिए।
कृषि विभाग के अनुसार समय पर बुवाई और भारी जमीन के लिए आरएच-1975 और आरएच-1706 किस्मों का चयन किया जा सकता है। सेम प्रभावित क्षेत्रों में सीएस-58, सीएस-60 और सीएस-62, जबकि रेतीले एवं टिब्बा क्षेत्रों में आरएच-1424, आरएच-725 और आरएच-761 किस्में उगाई जा सकती हैं। देरी से बुवाई के लिए किसानों को आरजीएन-236 किस्म का चयन करने की सलाह दी गई है।
चना फसल में सिंचित और समय पर बुवाई के लिए जीएनजी-2171 (मीरा), पछेती बुवाई के लिए जीएनजी-2261 (केशव) तथा असिंचित क्षेत्रों के लिए जीएनजी-2461 (मूमल) किस्म अपनाने की सिफारिश की गई है।
कृषि विभाग ने बेहतर स्वास्थ्य, कम लागत और पोषण सुरक्षा के लिए भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल द्वारा विकसित छिलका रहित जौ की डीडब्ल्यूआरबी-223 किस्म अपनाने पर भी जोर दिया है। विभाग के अनुसार इस किस्म के दाने को आसानी से उपयोग में लिया जा सकता है। इससे रोटी, दलिया और बिस्किट बनाए जा सकते हैं। गेहूं की तुलना में इसमें करीब 30-40 प्रतिशत कम पानी और उर्वरकों की आवश्यकता बताई गई है। यह किस्म लवणीय और क्षारीय भूमि में भी उगाई जा सकती है तथा इसकी औसत पैदावार 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है।
बदलती जलवायु, बढ़ते तापमान, सीमित सिंचाई जल, मौसम की अनिश्चितता और बढ़ती उत्पादन लागत के बीच गेहूं उत्पादन को अधिक जल-कुशल और जलवायु अनुकूल बनाने की जरूरत बताई गई है। विभाग के अनुसार केवल अधिक उपज क्षमता वाली किस्मों पर निर्भर रहने के बजाय ऐसी किस्मों का चयन जरूरी है, जो सीमित सिंचाई और स्थानीय परिस्थितियों में स्थिर उत्पादन दे सकें। इसके लिए डब्ल्यूएच-1402, डब्ल्यूएच-1142 और डीबीडब्ल्यू-296 जैसी किस्मों को सीमित सिंचाई में उत्पादन के लिए उपयुक्त बताया गया है।
डब्ल्यूएच-1402 किस्म में दो सिंचाई की सिफारिश की गई है। पहली सिंचाई बुवाई के करीब 25 दिन और दूसरी 70-80 दिन बाद करने की सलाह दी गई है। विभाग के अनुसार यह किस्म करीब 147 दिन में पककर तैयार होती है। इसकी औसत पैदावार 12 क्विंटल प्रति बीघा और अधिकतम पैदावार 17 क्विंटल प्रति बीघा दर्ज की गई है।
डीबीडब्ल्यू-296 (करण ऐश्वर्या) किस्म को भी दो से तीन सिंचाई में उत्पादन देने वाली किस्म बताया गया है। इसकी औसत उपज करीब 14 क्विंटल प्रति बीघा और अनुकूल परिस्थितियों में संभावित उत्पादन क्षमता 20 क्विंटल प्रति बीघा तक बताई गई है। विभाग के अनुसार यह किस्म सूखा और अधिक तापमान सहनशील है। यह रोटी, बिस्किट, ब्रेड और नान के लिए उपयुक्त है। डब्ल्यूएच-1402 और डीबीडब्ल्यू-296 में पीला, काला और भूरा रतुआ तथा करनाल बंट रोग के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता बताई गई है।
कृषि विभाग ने जल संरक्षण को फसल उत्पादन की मुख्य रणनीति बनाने पर जोर दिया है। खेत तालाब, भू-जल पुनर्भरण, खेतों का समतलीकरण और सूक्ष्म सिंचाई जैसी व्यवस्थाओं को सौर ऊर्जा, जल दक्षता और डिजिटल तकनीक से जोड़कर पानी की प्रत्येक बूंद से अधिक उत्पादन और आय प्राप्त करने की दिशा में काम करने की आवश्यकता बताई गई है। विभाग के अनुसार सरसों और चने की उन्नत फसल तकनीक तथा कम पानी वाली जलवायु अनुकूल किस्मों को अपनाकर कम लागत में बेहतर पैदावार ली जा सकती है। इससे खाद्य तेल और दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता के साथ पैदावार, पोषण और पर्यावरण सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।