किसानों का पानी पी जाएंगे डेटा सेंटर? सूखाग्रस्त महाराष्ट्र में पानी पर हक को लेकर सियासत – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: महाराष्ट्र का 74 फीसदी हिस्सा सूखाग्रस्त घोषित किया गया है. बारिश की कमी और जल उपलब्धता संकट के चलते राज्य के 34 जिलों की 265 तहसीलें सूखा प्रभावित मानी गई हैं. ऐसे में विपक्ष ने राज्य सरकार पर किसानों और ग्रामीणों के जल संसाधनों को छीनने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि है. कहा गया है कि महाराष्ट्र सरकार डेटा सेंटर उद्योग को बढ़ावा दे रही है, जिसमें सबसे ज्यादा खपत होने वाली दो चीजों में बिजली और पानी शामिल है. आरोप है कि जब राज्य पानी संकट और सूखे से ग्रस्त है तो सरकार ऐसा कदम क्यों उठा रही है कि किसानों से भविष्य का पानी भी छिन जाए. सरकार से सवाल पूछा गया है कि पानी पर पहला हक किसान का है कि डेटा सेंटर का.

जल संरक्षण पर काम कर रहे मंगलभूमि फाउंडेशन के प्रमुख रामबाबू तिवारी ने कहा कि किसी भी राज्य की सरकारों को पहले पीने के लिए फिर फसलों को पानी उपलब्ध कराने पर फोकस करना चाहिए.

महाराष्ट्र सरकार ने बारिश की कमी के बीच शनिवार को राज्य के 358 में से 265 तालुकों में सूखा घोषित किया और फसल ऋण नियमों को आसान बनाने, भू-राजस्व में रियायत तथा बिजली बिलों में सब्सिडी समेत राहत उपायों की एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि . लेकिन, कांग्रेस ने रविवार को डेटा सेंटर उद्योग के तेजी से विस्तार की नीति पर सवाल उठाए और पूछा कि यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार की क्या योजना है कि इस विस्तार को बढ़ावा देने के लिए राज्य के जल संसाधनों को किसानों एवं आम नागरिकों से छीना न जाए.

कांग्रेस के मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र के 358 में से 265 तालुकों में आधिकारिक तौर पर सूखा घोषित किया है, जो राज्य का करीब 75 फीसदी हिस्सा है. उन्होंने कहा कि यह ऐसे समय में हो रहा है जब महाराष्ट्र डेटा सेंटर उद्योग का तेजी से विस्तार कर रहा है. उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि राज्य को डेटा सेंटर के लिए 300 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिले हैं और 2032 तक 5.7 गीगावाट डेटा सेंटर क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है.

कांग्रेस नेता खेड़ा ने कहा कि डेटा सेंटर के लिए दो महत्वपूर्ण संसाधनों बिजली और पानी की जरूरत होती है. वे कितनी मात्रा में पानी का इस्तेमाल करते हैं, यह इस्तेमाल की जाने वाली चिल्ड तकनीक पर निर्भर करता है, लेकिन पानी की जरूरत एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, खासकर महाराष्ट्र जैसे जल संकट वाले क्षेत्रों में. उन्होंने कहा कि सरकार कथित तौर पर ऐसी व्यवस्था बनाने की योजना बना रही है, जिसमें नगर निगम सीवेज का शोधन करेंगे, महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम उसे और अधिक शुद्ध करेगा और इसके बाद इस रिसाइकिल किए गए पानी को डेटा सेंटर और अन्य उद्योगों को बेचा जाएगा.

खेड़ा ने कहा कि लेकिन कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं. जब महाराष्ट्र का करीब तीन-चौथाई हिस्सा आधिकारिक तौर पर सूखे की चपेट में है, तो यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार की क्या योजना है कि डेटा सेंटर के इस बड़े विस्तार को बढ़ावा देने के लिए राज्य के जल संसाधनों को किसानों और आम नागरिकों से छीना न जाए? उन्होंने पूछा कि महाराष्ट्र जैसे राज्य में जहां देश में किसान आत्महत्या की दर सबसे अधिक है, पानी पर पहला अधिकार किसका है- किसानों का या डेटा सेंटर का?

कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर राज्य उद्योगों के लिए सीवेज के शोधन और पानी के रिसाइकिल का नेटवर्क स्थापित करने को तैयार हैं, तो किसानों के लिए विश्वसनीय रिसाइकिल किया गया पानी उपलब्ध कराने में ऐसी तत्परता क्यों नहीं दिखाई गई, जिससे किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली समस्या कम करने में मदद मिल सकती है? उन्होंने सूखाग्रस्त किसानों को राहत देने और उनके भविष्य को बचाने के सरकारी दावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

डेटा सेंटर (Data Center) एक सुरक्षित इमारत होती है, जहां बड़ी संख्या में शक्तिशाली कंप्यूटर सर्वर, डेटा स्टोरेज डिवाइस और नेटवर्किंग उपकरण रखे जाते हैं. डेटा सेंटर के अंदर हजोरों सर्वर और जीपीयू (GPUs) लगातार चलते हैं जिससे भारी गर्मी पैदा होती है. इन सर्वरों को ठंडा रखने के लिए इवापोरेटिव कूलिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिसमें पानी का भारी मात्रा में वाष्पीकरण (evaporation) होता है.

अमेरिका के इनवॉयरमेंटल एंड एनर्जी स्टडी इंस्टीट्यूट (EESI) की रिपोर्ट के अनुसार डेटा सेंटर के पानी की खपत उसके आकार, मौसम और कूलिंग तकनीक पर निर्भर करती है. एक मध्यम से बड़े आकार का डेटा सेंटर हर महीने लगभग 30 करोड़ से 50 करोड़ लीटर (या प्रतिदिन 1 करोड़ से 1.9 करोड़ लीटर) पानी का इस्तेमाल करता है. अगर तुलना करें तो एक बड़े डेटा सेंटर की पानी की यह खपत 10,000 से 50,000 की आबादी वाले छोटे शहर के बराबर होती है.

मंगलभमि फाउंडेशन के प्रमुख रामबाबू तिवारी ने किसान इंडिया को बताया कि देश के जल संकट जूझते इलाकों में बुंदेलखंड, विदर्भ, मराठवाड़ा क्षेत्र का नाम पहले आता है. सरकारों ने भी माना है कि यहां स्थिति गंभीर है. उन्होंने कहा कि सबसे पहले तो बारिश के पानी को संचित करने पर ध्यान देना होगा. सूखा प्रभावित इलाकों के लिए विषेश जागरूकता अभियान और उपाय समय रहते किए जाने चाहिए.

बुंदेलखंड के अलग-अलग जिलों में 75 तालाबों को बचाने और पुनर्जीवित करने वाले रामबाबू ने बताया का काम किया है. उन्होंने बताया कि कृषि के लिए पानी बेहद जरूरी है और किसानों का पानी पर पहला अधिकार बनता है. उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य में सरकारों को पहले फसलों के लिए फिर पनी के लिए पानी की व्यवस्था पर जोर देना चाहिए.

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