एग्रीवेट: 24 सितंबर 2026, शहडोल: शहडोल: किसानों को बताया दलहन, धान एवं मिर्च फसलों में कीट-व्याधि प्रबंधन – कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल द्वारा किसानों को विभिन्न फसलों में कीट एवं व्याधियों की रोकथाम, प्राकृतिक एवं जैविक उपायों तथा सुरक्षित तरीके से कृषि रसायनों के उपयोग के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई।
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह ने बताया कि उड़द भारत की महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इसकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं। उड़द को हरी खाद के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। फसल की कटाई के बाद इसके अवशेष मिट्टी में मिलकर कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने में सहायक होते हैं। उड़द की फसल लगभग 60 से 70 दिनों में तैयार हो जाती है, जिससे किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने बताया कि जिले में धान की फसल में इन दिनों सफेद माहू, तना छेदक, तना गलन एवं शीथ ब्लाइट जैसी कीट एवं व्याधियों का प्रकोप देखा जा रहा है। उन्होंने किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने तथा प्रारंभिक अवस्था में ही रोकथाम के उपाय अपनाने की सलाह दी। धान के तनों पर सफेद माहू का प्रकोप होने पर पत्तियां सुनहरी-पीली पड़ने लगती हैं। इसके नियंत्रण के लिए नीम तेल लगभग 1 लीटर प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई। किसानों को रासायनिक कीटनाशकों के साथ प्राकृतिक एवं जैविक उपायों को भी प्राथमिकता देने की सलाह दी गई। धान में कीट प्रकोप की प्राथमिक रोकथाम के लिए प्राकृतिक तरीके से तैयार नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र एवं दशपर्णी अर्क को उपयोगी बताया गया। इनके उपयोग से फसल की सुरक्षा के साथ मित्र कीटों एवं मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में भी सहायता मिलती है। अधिक प्रकोप होने पर अनुशंसित कीटनाशकों में से किसी एक का उपयोग करने की सलाह दी गई।
डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने मूंग एवं उड़द में लगने वाले मोजेक रोग के संबंध में भी किसानों को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है और इससे उपज में 50 से 60 प्रतिशत तक कमी हो सकती है। रोग की प्रारंभिक अवस्था में ही रोगग्रस्त पौधों को खेत से उखाड़ कर बाहर करने की सलाह दी गई। सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए नीम तेल 3000 पीपीएम का 3 से 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करने की जानकारी दी गई।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. दीपक चौहान ने मिर्च की फसल में काले एफिड्स के प्रकोप एवं नियंत्रण के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि काले एफिड्स रस चूसने वाले हानिकारक कीट हैं, जिनके प्रकोप से पत्तियां मुड़ने लगती हैं, पौधों का विकास प्रभावित होता है तथा उत्पादन में कमी आ सकती है। ये कीट विषाणु जनित रोगों के वाहक के रूप में भी कार्य कर सकते हैं। इनके नियंत्रण के लिए नीमास्त्र को स्वदेशी, प्रभावी, किफायती एवं पर्यावरण अनुकूल उपाय बताया गया। नीमास्त्र में मौजूद नीम आधारित यौगिक एफिड्स की सामान्य गतिविधियों को प्रभावित करते हैं तथा इसकी तीखी गंध एवं कड़वा स्वाद कीटों को दूर रखने में सहायक होता है।
कृषि विस्तार अधिकारी सोहागपुर श्रीमती हिमानी एवं आत्मा परियोजना से बीटीएम गोहपारू श्री तारकेश्वर ने किसानों को खरपतवार नाशक, फंगस नाशक एवं कीटनाशकों के उपयोग के दौरान आवश्यक सावधानियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रासायनिक दवाओं का छिड़काव करते समय दस्ताने, मास्क, चश्मा, एप्रन एवं गमबूट का उपयोग करना चाहिए, ताकि कीटनाशक त्वचा अथवा सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश न कर सके। छिड़काव सुबह या देर शाम, जब हवा की गति कम हो, तब करना चाहिए तथा तेज धूप में छिड़काव से बचना चाहिए। उन्होंने किसानों को रासायनिक दवाओं का घोल साफ पानी से तैयार करने तथा उसे हाथों की जगह लकड़ी की छड़ी से मिलाने की सलाह दी। स्प्रेयर पंप का नोजल बंद होने पर उसे मुंह से फूंक कर साफ नहीं करने तथा छिड़काव के बाद पंप को पानी से अच्छी तरह धोकर साफ करने की जानकारी भी दी गई।