मीठे जल में छोटे मछुआरों की आजीविका सुधारने बनेगी राष्ट्रीय कार्ययोजना—पढ़ें इनसाइड स्टोरी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 26 अक्टूबर 2026, भोपाल: मीठे जल में छोटे मछुआरों की आजीविका सुधारने बनेगी राष्ट्रीय कार्ययोजना – देश में अंतर्देशीय लघु मत्स्य पालन को बढ़ावा देने, मछुआरा समुदायों की आजीविका में सुधार लाने और मीठे जल के संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार की जा रही है। केंद्रीय मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने शुक्रवार को भोपाल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में ‘अंतर्देशीय लघु मत्स्य पालन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना’ (एनपीओए) के विकास चरण का औपचारिक शुभारंभ किया।

यह योजना संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के ढांचे के तहत विकसित की जा रही है। इसके निर्माण में भारत सरकार का मत्स्य विभाग और बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम अंतर-सरकारी संगठन (बीओबीपी-आईजीओ) सहयोग कर रहे हैं। इसका उद्देश्य छोटे स्तर पर मछली पकड़ने और मत्स्य पालन से जुड़े लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्र का समग्र विकास करना है।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए डॉ. अभिलक्ष लिखी ने कहा कि राष्ट्रीय कार्ययोजना का वास्तविक प्रभाव मछुआरों और उनके परिवारों की रोजमर्रा की आजीविका में दिखाई देना चाहिए। योजना तैयार करते समय मछुआरा समुदायों के अनुभवों और उनकी आवश्यकताओं को प्राथमिकता देना जरूरी है, ताकि इसके प्रावधान जमीन पर उपयोगी साबित हो सकें।

उन्होंने अंतर्देशीय मत्स्य पालन के सामने मौजूद चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन, जल गुणवत्ता में गिरावट और जल निकायों में ऑक्सीजन का स्तर कम होना इस क्षेत्र के लिए गंभीर विषय हैं। इन परिस्थितियों का असर मछलियों के जीवन, उत्पादन और मछुआरों की आय पर पड़ सकता है। इसलिए कार्ययोजना में जलवायु संबंधी जोखिमों से निपटने के व्यावहारिक उपाय शामिल किए जाने चाहिए।

राष्ट्रीय कार्ययोजना के विकास चरण में कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार किया जाएगा। इनमें मछली पकड़ने के अधिकार, जलीय संसाधनों का प्रबंधन, रोजगार के अवसर, सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां और लैंगिक समानता प्रमुख हैं। इसके साथ ही मत्स्य उत्पादों की मूल्य शृंखला को मजबूत करने तथा मछली पकड़ने के बाद उनके भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन और बिक्री से जुड़े कारोबार को बेहतर बनाने पर भी काम होगा।योजना में मछुआरों की भागीदारी और उनके अधिकारों को ध्यान में रखते हुए संसाधनों के टिकाऊ उपयोग पर जोर दिए जाने की संभावना है। इससे छोटे मछुआरों को मत्स्य संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े निर्णयों में शामिल करने और उनके आर्थिक अवसरों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

कार्ययोजना में प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को भी शामिल किया जाएगा। बदलती जलवायु, जल निकायों की स्थिति में बदलाव और पानी की गुणवत्ता संबंधी समस्याएं अंतर्देशीय मत्स्य पालन की उत्पादकता को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उपाय विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।

भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला को इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। इसके माध्यम से अंतर्देशीय लघु मत्स्य पालन से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श कर ऐसी कार्य योजना विकसित करने पर जोर है, जो मछुआरों की आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, समान अवसर और मीठे जल के संसाधनों के संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ा सके।

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