एग्रीवेट: Vietnam Basa Fish: भारत में मछली पालन करने वाले किसानों के सामने अब विदेशी मछली से प्रतिस्पर्धा की चुनौती बढ़ रही है. वियतनाम से आने वाली सस्ती फ्रोजन बासा मछली भारतीय बाजार में तेजी से अपनी जगह बना रही है. कम कीमत और लगातार उपलब्धता के कारण होटल, रेस्तरां, कैफे और शादी-पार्टियों में इसकी मांग बढ़ रही है. वहीं, घरेलू बासा मछली की कीमत अधिक होने से भारतीय उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने वियतनाम से 11,329 टन बासा मछली का आयात किया, जो पिछले साल के 10,109 टन से ज्यादा है. ऐसे में सवाल है कि सस्ती विदेशी मछली की बढ़ती मांग का भारत के मछली पालकों पर क्या असर पड़ सकता है?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,भारतीय बाजार में घरेलू बासा मछली की कीमत करीब 250 से 600 रुपये प्रति किलो तक बताई जा रही है. इसके मुकाबले वियतनाम से आने वाली फ्रोजन बासा मछली का थोक और खुदरा भाव लगभग 170 से 400 रुपये प्रति किलो के बीच है. कीमतों में यह अंतर होटल और रेस्तरां जैसे बड़े खरीदारों को विदेशी मछली की ओर आकर्षित कर रहा है. कम कीमत के साथ इसकी नियमित सप्लाई भी कारोबारियों के लिए फायदेमंद मानी जा रही है. हालांकि, वास्तविक कीमत मछली की गुणवत्ता, आकार, बिक्री के स्तर और बाजार के हिसाब से बदल सकती है.
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वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल बासा मछली आयात मूल्य के आधार पर 14.3 प्रतिशत बढ़कर 1.83 करोड़ डॉलर पहुंच गया. इससे पिछले वित्त वर्ष में यह 1.60 करोड़ डॉलर था. वियतनाम से आयात का मूल्य 13.7 प्रतिशत बढ़कर 1.82 करोड़ डॉलर हो गया. मात्रा के लिहाज से भी आयात में बढ़ोतरी दर्ज की गई. वित्त वर्ष 2025-26 में वियतनाम से 11,329 टन बासा मछली भारत आई, जबकि पिछले वर्ष यह मात्रा 10,109 टन थी. चालू वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में भी आयात में 19.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी बताई गई है.
वियतनाम की बासा मछली की मांग बढ़ने की एक बड़ी वजह इसकी प्रतिस्पर्धी कीमत है. होटल, रेस्तरां और कैफे को नियमित रूप से बड़ी मात्रा में मछली की जरूरत होती है. ऐसे में कम कीमत पर उपलब्ध फ्रोजन मछली उनके खर्च को कम करने में मदद कर सकती है. इसके अलावा, बासा मछली के मांस में कांटे कम होने के कारण इसे कई तरह के व्यंजन बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. शादी-पार्टियों और खाद्य कारोबार में भी इसकी मांग बनी हुई है. लगातार सप्लाई मिलने से कारोबारियों को अपनी जरूरत के मुताबिक स्टॉक रखना आसान होता है.
भारत दुनिया के प्रमुख मछली उत्पादक देशों में शामिल है. वित्त वर्ष 2024-25 में देश का कुल मछली उत्पादन करीब 1.97 करोड़ टन रहा. इसके बावजूद बासा मछली के मामले में घरेलू उत्पादकों को लागत और उत्पादन क्षमता से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. यदि विदेशी बासा मछली कम कीमत पर उपलब्ध रहती है, तो घरेलू उत्पादकों के लिए बाजार में अपनी जगह बनाए रखना मुश्किल हो सकता है. ऐसे में उत्पादन लागत घटाने, बेहतर प्रबंधन अपनाने, गुणवत्ता सुधारने और स्थानीय बाजारों से सीधा जुड़ाव बढ़ाने पर ध्यान देना जरूरी होगा. हालांकि, आयात का बढ़ना अपने आप में घरेलू मछली पालकों को होने वाले नुकसान का प्रमाण नहीं है. इसका वास्तविक असर स्थानीय उत्पादन, मांग, कीमतों और उपभोक्ताओं की पसंद पर निर्भर करेगा.