एग्रीवेट: 23 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: ‘अन्नदाता’ के साथ अब ‘ऊर्जादाता’ भी बनेंगे देश के किसान: 7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस में बोले कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान – केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के किसान अब अन्नदाता के साथ-साथ ऊर्जादाता भी बनने जा रहे हैं। खेती के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन को जोड़कर किसानों की आर्थिक समृद्धि का नया रास्ता तैयार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि एग्रीवोल्टाइक तकनीक को बढ़ावा देने के लिए ऐसी नीतियां बनाने की जरूरत है, जो देश के 85 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी व्यावहारिक साबित हों।
शिवराज सिंह चौहान बुधवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित तीन दिवसीय 7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने खेती और सौर ऊर्जा के समन्वय को किसानों की आय बढ़ाने, ऊर्जा उत्पादन को प्रोत्साहित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
केंद्रीय मंत्री ने एग्रीवोल्टाइक तकनीक की विशेषताओं को समझाते हुए कहा कि इसमें एक ही जमीन पर सौर पैनल लगाकर बिजली पैदा की जा सकती है और उनके नीचे फसलों की खेती भी की जा सकती है। इससे कृषि भूमि का दोहरा उपयोग संभव होगा। उन्होंने इस मॉडल को ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ जैसा बताते हुए कहा कि मौजूदा समय में बिजली आधुनिक जीवन और खेती, दोनों की जरूरत बन गई है। उन्होंने कहा कि पहले ‘रहिमन पानी राखिये’ की बात कही जाती थी, लेकिन आज के दौर में बिजली का महत्व भी उतना ही बढ़ गया है। खेती के साथ ऊर्जा उत्पादन को जोड़ना किसानों के हित में बड़ा कदम साबित हो सकता है।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत में औसत भूमि जोत केवल 0.96 हेक्टेयर है और 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं। ऐसे में किसानों के लिए एग्रीवोल्टाइक का ऐसा मॉडल तैयार करना जरूरी है, जिसे वे अपनी सीमित जमीन पर भी अपना सकें। किसान अपनी पूरी जमीन पर खेती छोड़कर केवल सौर ऊर्जा संयंत्र नहीं लगा सकते। इसलिए इस तकनीक के इस्तेमाल से कृषि उत्पादन प्रभावित नहीं होना चाहिए। उन्होंने वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं से कहा कि सौर पैनलों की ऊंचाई, खंभों के बीच की दूरी और खेतों में जुताई की व्यवस्था इस तरह तय की जानी चाहिए कि किसान अपनी जरूरत के अनुसार फसल और फसल चक्र बदल सकें। केवल सौर पैनलों के नीचे कुछ पौधे लगा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि खेती की नियमित गतिविधियों को जारी रखने की व्यवस्था भी जरूरी है।
केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं में सौर पैनलों से गिरने वाले वर्षा जल के सुरक्षित निकास और संचयन की व्यवस्था होनी चाहिए। इससे मिट्टी के कटाव को रोकने और पानी का बेहतर उपयोग करने में मदद मिलेगी। उन्होंने बिजली खरीद, ग्रिड तक बिजली पहुंचाने और किसानों को समय पर पारदर्शी भुगतान सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया। साथ ही किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को इस व्यवस्था से जोड़ने और स्थानीय ग्रामीण युवाओं तथा महिलाओं को सौर उपकरणों के संचालन, मरम्मत और रखरखाव का प्रशिक्षण देने का सुझाव दिया। इससे गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई कंपनी परियोजना बीच में छोड़ देती है या अनुबंध समाप्त होने पर सौर पैनल हटाने की जरूरत पड़ती है, तो इसका आर्थिक और भौतिक बोझ किसान पर नहीं पड़ना चाहिए। इसके लिए शुरुआत से ही जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
कार्यक्रम में केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि 7वां एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस अब तक आयोजित छह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की तुलना में सबसे बड़ा है। इसमें रिकॉर्ड भागीदारी के कारण अतिरिक्त हॉल की व्यवस्था करनी पड़ी। उन्होंने बताया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी विकास दर 7.8 प्रतिशत रही। वर्ष 2014 से पहले देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 249 गीगावाट थी, जो अब बढ़कर 560 गीगावाट से अधिक हो गई है। इसमें गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की स्थापित क्षमता 308 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है। पिछले ढाई वर्षों में इसमें 100 गीगावाट क्षमता जोड़ी गई है।
प्रह्लाद जोशी ने टेरी (TERI) के एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि देश की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से 4.75 करोड़ हेक्टेयर भूमि एग्रीवोल्टाइक के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त है। इसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि यदि इस उपयुक्त भूमि के केवल 10 प्रतिशत हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक परियोजनाएं स्थापित की जाएं, तो वर्ष 2050 तक भारत की अनुमानित बिजली मांग को पूरा करने में इस तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ अध्ययनों में एग्रीवोल्टाइक प्रणाली के तहत फसलों की पैदावार में 10 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि पीएम कुसुम योजना के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है। इससे किसानों को दिन में सिंचाई के लिए बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिली है और रात के समय सिंचाई पर निर्भरता कम हुई है। उन्होंने एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि सरकार जल्द ही पीएम कुसुम योजना के अगले चरण के तहत एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। उनके अनुसार, अध्ययनों में इस क्षेत्र में लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा होने की संभावना जताई गई है। इससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन करने के बजाय अपने क्षेत्र में ही अवसर मिल सकते हैं।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाईक, भारत एवं भूटान में जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर विक, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव अतीश चंद्रा, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के महानिदेशक आशीष खन्ना सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और प्रतिनिधि उपस्थित रहे। इस अवसर पर एग्रीवोल्टाइक से जुड़े महत्वपूर्ण तकनीकी उपकरणों और संचार सामग्रियों