एग्रीवेट: Indigenous Livestock Breeds: देश में गाय, भैंस, बकरी और भेड़ पालने वाले किसानों के लिए एक अहम खबर है. केंद्र सरकार ने 13 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश से जुड़ी पशुओं और कुत्तों की 16 नस्लों को आधिकारिक पहचान दी है. इस लिस्ट में गाय, भैंस, बकरी, भेड़, गधा, घोड़ा, सूअर, याक और कुत्ते की नस्लें शामिल हैं. इससे इन देसी नस्लों को बचाने और आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी. साथ ही, पशुपालन से जुड़े किसानों और ग्रामीण परिवारों को भी फायदा पहुंच सकता है.
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत पशु नस्लों को पहचान देने की यह प्रक्रिया पूरी की गई है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 7 अगस्त को नस्ल पंजीकरण समिति की 14वीं बैठक की सिफारिशों के आधार पर इन देसी नस्लों को मान्यता दिए जाने की जानकारी दी थी. इसके बाद 16 अक्टूबर को इससे जुड़ी अधिसूचना जारी की गई, जो अब प्रकाशित हुई है.
इस काम की जिम्मेदारी हरियाणा के करनाल में मौजूद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (ICAR-NBAGR) की है. यह संस्थान देश में पशुओं की अलग-अलग नस्लों की पहचान करने, उनकी खासियत समझने और उन्हें बचाने के लिए काम करता है.
नई लिस्ट में अलग-अलग राज्यों की स्थानीय नस्लों को जगह मिली है. इनमें कर्नाटक की कोप्पल और केरल की पेरियार गाय की नस्लें शामिल हैं. मध्य प्रदेश की महाकौशली और महाराष्ट्र की उमरदा नस्ल को भी पहचान दी गई है. गोवा की गोमांचली भैंस भी इस सूची का हिस्सा है. बकरी की नस्लों में राजस्थान की बत्तीसी और उत्तर प्रदेश की तोतापुरी को शामिल किया गया है. भेड़ की नस्लों में असम की असोमी, उत्तराखंड की कौ डाबर, महाराष्ट्र की मडग्याल और बिहार की सीमांचली शामिल हैं.
इसके अलावा उत्तर प्रदेश की ब्रज गधी, जम्मू-कश्मीर का कश्मीरी घोड़ा, नागालैंड का नागल सूअर और सिक्किम का याक भी इस लिस्ट में शामिल हैं. तमिलनाडु के कोम्बई कुत्ते को भी आधिकारिक पहचान मिली है.
भारत के अलग-अलग इलाकों में पाले जाने वाले देसी पशुओं की अपनी खासियत होती है. कई नस्लें वहां के मौसम, खानपान और स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से ढली होती हैं. ऐसे में उनकी पहचान होने से उन्हें बचाने और उनकी संख्या बढ़ाने के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है. सरकारी पहचान मिलने से इन नस्लों के प्रजनन, पालन-पोषण, इस्तेमाल और उनसे जुड़े कारोबार को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है. इससे पशुपालकों को भी अपनी स्थानीय नस्लों की खासियत समझने और उन्हें बेहतर तरीके से पालने का मौका मिलेगा.
इन 16 नस्लों को पहचानने और उनका रिकॉर्ड रखने के लिए अलग-अलग पहचान नंबर भी दिए गए हैं. इससे आगे चलकर इनके संरक्षण और सही जानकारी जुटाने में आसानी होगी. यह कदम देश के पशु संसाधनों को सहेजने की दिशा में अहम है, क्योंकि देसी नस्लों को बचाना केवल पशुपालन तक सीमित नहीं है. इससे ग्रामीण रोजगार, किसानों की कमाई और देश की पशुधन से जुड़ी विरासत को बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है.