एग्रीवेट: तेलंगाना सरकार राज्य में जीआई टैग वाली तंदूर लाल चने की दाल की पहचान सुरक्षित रखने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम शुरू करने जा रही है. इसके तहत करीब 65 हजार किसानों को शामिल किया जाएगा. इस व्यवस्था का मकसद खेत से लेकर खरीदार तक दाल की निगरानी करना और तंदूर दाल के नाम पर दूसरे उत्पादों की बिक्री रोकना है. इस परियोजना के तहत हर किसान की डिजिटल प्रोफाइल बनाई जाएगी. इसे उसकी जमीन, फसल और कटाई से जुड़ी जानकारी से जोड़ा जाएगा. इसके बाद फसल को इकट्ठा करने, प्रोसेसिंग और बाजार में पहुंचाने तक उसकी निगरानी की जाएगी. इससे सप्लाई चेन में किसी भी स्तर पर दाल की भौगोलिक पहचान और असली स्रोत की पुष्टि की जा सकेगी. वहीं, तंदूर लाल चने की चर्चा के बीच लोग इसके बारे में जानना चाहते हैं. खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार के लोगों में इसे लेकर उत्सुकता है, क्योंकि उत्तर भारत में इसकी खेती बहुत कम होती है. आइए जानते हैं, तंदूर लाल चना क्यों खास है और इसकी खेती कैसे की जाती है.
तंदूर लाल चने को साल 2022 में जीआई टैग मिला था. तेलंगाना की यलाल फार्मर्स प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड (FPO) ने इसकी दाल को जीआई टैग दिलाने के लिए 24 सितंबर 2020 को आवेदन किया था. यह आवेदन संख्या 706 के तहत दर्ज किया गया था. तंदूर लाल चने की दाल को प्रोटीन और दूसरे पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है. इसमें करीब 24 फीसदी प्रोटीन होने का दावा किया जाता है. इसके अलावा, इसमें अमीनो एसिड, लाइसिन, राइबोफ्लेविन, थायमिन, नियासिन और आयरन जैसे पोषक तत्व भी पाए जाते हैं. इन खूबियों के चलते यह दाल खास पहचान रखती है और शाकाहारी भोजन करने वाले लोगों के लिए उपयोगी मानी जाती है.
हालांकि, इस दाल को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया में तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय की प्रोफेसर जया शंकर ने भी अहम भूमिका निभाई. उन्होंने यालाल फार्मर्स प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड को आवेदन के लिए जरूरी मार्गदर्शन, शोध और तकनीकी जानकारी हासिल करने में मदद की. जीआई टैग मिलने से तंदूर क्षेत्र में उगाई जाने वाली इस खास दाल की पहचान सुरक्षित रखने और किसानों को बाजार में बेहतर अवसर दिलाने में मदद मिल मिल रही है.
तंदूर लाल चना दाल अरहर की एक स्थानीय किस्म है. इसकी खेती मुख्य रूप से तेलंगाना के तंदूर और आसपास के इलाकों में होती है. विशेषज्ञों के मुताबिक, इस क्षेत्र की गहरी काली मिट्टी, उसमें मौजूद खनिज और चूना पत्थर के भंडार इस दाल को खास बनाते हैं. इस दाल में करीब 24 फीसदी प्रोटीन होने का दावा किया जाता है.
जीआई टैग प्राप्त तंदूर लाल दाल की खेती मुख्य रूप से तेलंगाना के तंदूर और आसपास के इलाकों में होती है. यहां की मिट्टी में मौजूद खास खनिज और अनुकूल मौसम इस दाल के स्वाद और गुणवत्ता को अलग पहचान देते हैं. इस क्षेत्र में अच्छी बारिश भी इसकी खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है. फिलहाल तेलंगाना के विकाराबाद, नारायणपेट, संगारेड्डी और आदिलाबाद जिलों में करीब 1.74 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इस दाल की खेती होती है. ऐसे तंदूर लाल चना दाल का इतिहास करीब 3,500 साल पुराना माना जाता है. भारत समेत दक्षिण एशिया के कई देशों में इसकी अच्छी मांग है. इसके अलावा, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बाजारों में भी यह दाल लोकप्रिय है. फिलहाल इस क्षेत्र में करीब 63,500 किसान परिवार तंदूर लाल चने की खेती से जुड़े हुए हैं.
तंदूर लाल चने की बुवाई आमतौर पर जून-जुलाई में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत के साथ की जाती है. यह बारिश पर निर्भर रहने वाली फसल है. इसे पकने में करीब 130 से 180 दिन लगते हैं. यानी बुवाई के लगभग चार से छह महीने बाद फसल कटाई के लिए तैयार होती है. इस फसल की अच्छी पैदावार के लिए गर्म मौसम और पर्याप्त बारिश जरूरी है. इसकी खेती के लिए 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और सालाना करीब 600 से 1,000 मिलीमीटर बारिश अनुकूल मानी जाती है. हालांकि, फसल की बढ़वार और पैदावार पर मिट्टी, बारिश के वितरण और खेती के तरीकों का भी असर पड़ता है.