एग्रीवेट: 16 अक्टूबर 2026, गोसाईंगंज, (लखनऊ): मधुमक्खी पालन से सालाना तीन करोड़ रुपये का कारोबार, एक बी-बॉक्स से शुरू हुआ था सफर – लखनऊ जिले के मदारपुर केवली गांव के किसान ब्रजेश कुमार वर्मा की कहानी बताती है कि छोटी शुरुआत भी बड़ा मुकाम हासिल कर सकती है। महज 0.4 हेक्टेयर पुश्तैनी जमीन के मालिक ब्रजेश ने वर्ष 1990 में उत्तर प्रदेश उद्यान विभाग से मुफ्त में मिले एक बी-बॉक्स से मधुमक्खी पालन शुरू किया था। आज उनका कारोबार सालाना करीब तीन करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
शुरुआती दिनों में घर की आर्थिक तंगी के बीच ब्रजेश ने उसी एक बॉक्स से मिले शहद को बेचकर दो साल के भीतर दस और बी-बॉक्स खरीद लिए थे। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने अपने बॉक्स की संख्या बढ़ाई और मधुमक्खी पालकों को साथ जोड़ना शुरू किया।
ब्रजेश ने मधुमक्खी पालकों का एक समूह बनाया, जिसका नाम उन्होंने अभिषेक ग्रामोद्योग संस्थान रखा। यह समूह उत्तर प्रदेश सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के यहां पंजीकृत है। गोसाईंगंज में राज्य ग्राम विकास विभाग की मदद से शहद प्रसंस्करण इकाई भी लगाई गई है, जहां शहद को साफ-सुथरे तरीके से पैक किया जाता है।
वर्ष 2011 से इस समूह ने मधुमक्खी पालन से जुड़े अन्य उत्पादों, जैसे पराग और प्रोपोलिस का संकलन भी शुरू किया। फिलहाल समूह सालाना करीब 350 टन शहद, 150 किलोग्राम पराग और 100 किलोग्राम प्रोपोलिस का उत्पादन कर रहा है। यह उत्पाद एफएसएसएआई प्रमाणित किरण एंटरप्राइजेज के जरिये बाजार में बेचे जाते हैं।
ब्रजेश के मुताबिक, फूलों के मौसम के हिसाब से वे अपने करीब 600 बी-बॉक्स उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग-अलग इलाकों में ले जाते हैं, ताकि मधुमक्खियों को लगातार पर्याप्त फूल मिलते रहें और शहद का उत्पादन बना रहे।
यह पूरी सफलता भाकृअनुप-भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के अंतर्गत आने वाले कृषि विज्ञान केंद्र, लखनऊ के मार्गदर्शन में संभव हो सकी है। ब्रजेश अब तक जिले में करीब छह हजार किसानों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दे चुके हैं और करीब 1,120 मधुमक्खी पालकों को आपस में जोड़ चुके हैं।
इतना ही नहीं, ब्रजेश ने अब बी-बॉक्स, फ्रेम और अन्य उपकरण बनाने का काम भी शुरू कर दिया है, ताकि दूसरे किसानों को सस्ते दामों पर जरूरी सामान मिल सके। वे केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन बोर्ड के आजीवन सदस्य भी हैं।
ब्रजेश की शुरुआत उस दौर में हुई थी, जब गांव में ज्यादातर किसान परंपरागत खेती पर ही निर्भर थे और मधुमक्खी पालन को लेकर जानकारी बहुत कम थी। महज 0.4 हेक्टेयर जमीन के सहारे परिवार चलाना मुश्किल था, ऐसे में उद्यान विभाग से मिला एक बी-बॉक्स उनके लिए नई राह बना।
शुरुआती दो वर्षों में मिली सफलता के बाद ब्रजेश ने इसे व्यवसाय के तौर पर अपनाने का फैसला किया। उन्होंने आसपास के गांवों के किसानों को भी मधुमक्खी पालन सिखाना शुरू किया, जिससे धीरे-धीरे एक पूरा नेटवर्क खड़ा हो गया। आज गोसाईंगंज ब्लॉक के अलावा जिले के कई हिस्सों के किसान उनके समूह से जुड़े हुए हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र, लखनऊ के विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रजेश जैसे किसानों की सफलता इस बात का उदाहरण है कि कम जमीन वाले किसान भी, अगर सही तकनीक और बाजार से जुड़ाव मिल जाए, तो परंपरागत खेती के अलावा आमदनी का बड़ा जरिया खड़ा कर सकते हैं। मधुमक्खी पालन के लिए बहुत ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं होती, इसलिए यह भूमिहीन और छोटे किसानों के लिए खासतौर पर फायदेमंद साबित हो रहा है।
मधुमक्खी पालन का एक और फायदा यह भी है कि इससे आसपास के खेतों में परागण बेहतर होता है, जिससे सरसों, सूरजमुखी और फलदार पेड़ों की पैदावार भी बढ़ती है। यही वजह है कि कृषि वैज्ञानिक किसानों को अपनी मुख्य फसल के साथ-साथ मधुमक्खी पालन को भी अतिरिक्त आमदनी के जरिये के तौर पर अपनाने की सलाह देते हैं।