एग्रीवेट: 16 अक्टूबर 2026, चित्रकूट (उत्तर प्रदेश): कम लागत और ज्यादा मुनाफा: चित्रकूट के किसानों ने अपनाई प्राकृतिक खेती, घटी लागत तो बढ़ी फसल की कीमत – उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में कई किसान अब रासायनिक खाद और कीटनाशकों को छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर लौट रहे हैं। किसानों का कहना है कि इससे न सिर्फ खेती की लागत घटी है, बल्कि फसल की कीमत भी पहले से बेहतर मिल रही है।
बैहर गांव के रिटायर्ड शिक्षक नाथूराम इसकी मिसाल हैं। उन्होंने झांसी के चिरगांव स्थित सरकारी कृषि विद्यालय से प्रशिक्षण लेकर वर्ष 2022 में प्राकृतिक खेती शुरू की थी। आज वे अपनी 18 बीघा जमीन पर फलदार बागों के साथ-साथ अन्य फसलें भी उगा रहे हैं और उन्हें सालाना चार से पांच लाख रुपये तक का मुनाफा हो रहा है।
मानिकपुर तहसील के बरहट गांव के किसान कोठारी सिंह पटेल ने वर्ष 2023 में प्राकृतिक खेती अपनाई थी। वे धान, अरहर और ज्वार की खेती करते हैं। उनका कहना है कि रासायनिक खेती के दौरान उन्हें शुगर और ब्लड प्रेशर जैसी दिक्कतें रहती थीं, जो प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद काफी हद तक नियंत्रण में आ गई हैं।
करवी तहसील के किसान योगेश जैन का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है। उनका कहना है कि लगातार रासायनिक खाद के इस्तेमाल से उनकी जमीन बंजर होने लगी थी। उन्होंने पशुपालन शुरू किया और गोबर व गोमूत्र से खुद खाद बनाना शुरू किया। अब वे रबी और खरीफ, दोनों सीजन की फसलें प्राकृतिक तरीके से उगा रहे हैं।
जिला कृषि उप निदेशक जीत लाल गुप्ता ने बताया कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन चला रही हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2026-27 के लिए जिले में 25 क्लस्टर बनाकर करीब 3,125 किसानों को इस मिशन से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।
गुप्ता के मुताबिक मिशन के तहत किसानों को प्रशिक्षण के साथ-साथ जीवामृत, बीजामृत जैसी देसी तकनीकों की जानकारी भी दी जा रही है, ताकि वे बिना रासायनिक खाद के भी अच्छी पैदावार ले सकें। उनका कहना है कि शुरुआती नतीजे उत्साहजनक रहे हैं और आने वाले समय में और किसान इस तरीके को अपनाएंगे।
जिला कृषि विभाग के मुताबिक, मिशन के तहत हर क्लस्टर में किसानों को समूह बनाकर प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसमें देसी गाय आधारित खाद बनाने की विधि, कीट प्रबंधन के देसी तरीके और फसल चक्र में बदलाव जैसे विषय शामिल हैं। विभाग का कहना है कि शुरुआत में किसानों को कुछ समय तक पैदावार में मामूली कमी का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन दो-तीन साल बाद मिट्टी की सेहत सुधरने पर उत्पादन फिर से स्थिर हो जाता है।
नाथूराम बताते हैं कि वे अपने खेत में फलदार पेड़ों के साथ सब्जियां और अनाज की सहफसली खेती करते हैं, जिससे साल भर कोई न कोई उपज मिलती रहती है। उनका कहना है कि आसपास के कई किसान अब उनके खेत को देखने आते हैं और प्राकृतिक खेती की बारीकियां समझना चाहते हैं।
कोठारी सिंह पटेल के मुताबिक उन्होंने जैविक खाद बनाने के लिए अपने घर पर ही गोबर और गोमूत्र से जीवामृत तैयार करना सीखा है, जिससे बाजार से खाद खरीदने में होने वाला खर्च पूरी तरह बच जाता है। वे कहते हैं कि उनकी फसल की गुणवत्ता बेहतर होने से स्थानीय बाजार में उन्हें अच्छा दाम मिल रहा है।
योगेश जैन का कहना है कि उन्होंने पहले गायों की संख्या बढ़ाई, ताकि गोबर और गोमूत्र की कमी न हो। अब वे अपनी जरूरत की खाद खुद तैयार करते हैं और आसपास के किसानों को भी यह तरीका सिखाते हैं। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी जमीन की उर्वरा शक्ति भी धीरे-धीरे लौट रही है।
नाथूराम, पटेल और जैन जैसे किसानों की कहानी बता रही है कि कम लागत वाली प्राकृतिक खेती न सिर्फ मिट्टी और सेहत के लिए फायदेमंद है, बल्कि किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी मददगार साबित हो रही है। जिला कृषि विभाग को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में जिले के और किसान इस मॉडल से जुड़ेंगे।