एग्रीवेट: 12 अक्टूबर 2026, बड़वानी: मियावाकी पद्धति से संवरती बड़वानी की धरा – पर्यावरण संरक्षण और जल-मृदा संरक्षण की दिशा में जब आधुनिक तकनीकों का समावेश होता है, तो परिणाम सुखद और दूरगामी होते हैं। बड़वानी जिले में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0 (वाटरशेड विकास) के तहत अपनाया गया *जापानी ‘मियावाकी वनीकरण’* का प्रयोग आज एक सफल मॉडल बनकर उभरा है। बड़वानी की बंजर और कम हरियाली वाली शासकी भूमियों पर यह तकनीक अब घने जंगलों का रूप ले चुकी है।
इसी सफलता को आगे बढ़ाते हुए हाल ही में जिले के वाटरशेड परियोजना अंतर्गत माइक्रो वाटरशेड इंद्रपुर में मियावाकी पद्धति से 3,500 नए पौधों का रोपण किया गया है। इस वृक्षारोपण की सबसे खास बात यह है कि इसमें केवल एक प्रजाति के पौधे नहीं, बल्कि फलदार, वानिकी (फॉरेस्ट्री) और बहुउपयोगी फूलों की प्रजातियों का संतुलित संयोजन किया गया है, जो आने वाले समय में यहाँ की पारिस्थितिकी को और समृद्ध बनाएगा।
9 स्थानों पर 27 हजार पौधे बने ‘मिनी फॉरेस्ट’ – प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0 की 4 परियोजनाओं के अंतर्गत पिछले वर्षों में जिले के 9 अलग-अलग स्थानों पर मियावाकी वनीकरण अभियान चलाया गया था। इस दौरान कुल 27,000 पौधों का रोपण किया गया था। सामान्य वृक्षारोपण की तुलना में 10 गुना तेजी से बढ़ने वाली मियावाकी पद्धति का ही परिणाम है कि महज कुछ ही वर्षों में ये पौधे अब विशाल और घने पेड़ों के समूह में तब्दील हो चुके हैं। जहाँ कभी वनस्पति विहीन खाली पहाड़िया थी, आज वहाँ लहराते घने जंगल नज़र आते हैं।
प्रकृति और वन्य जीवों को मिला नया जीवन – मियावाकी सघन वनीकरण के बहुआयामी लाभ अब धरातल पर दिखाई देने लगे हैं:
क्या है मियावाकी तकनीक? – मियावाकी जापानी वनस्पति शास्त्री अकिरा मियावाकी द्वारा विकसित एक ऐसी पद्धति है, जिसमें कम जगह पर पौधों को बहुत पास-पास (सघन) रोपा जाता है। इससे पौधे सूर्य के प्रकाश के लिए तेज़ी से ऊपर की ओर बढ़ते हैं। यह तकनीक पारंपरिक वनीकरण की तुलना में 10 गुना तेज़ी से बढ़ती है और 30 गुना अधिक घनी होती है।