गेहूं-धान के चक्र से बाहर निकलेगा पंजाब! कम पानी वाली फसलों पर जोर, खेती में बदलाव की तैयारी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के नवनियुक्त कुलपति डॉ. हरविंदर सिंह धालीवाल ने राज्य में खेती के तरीकों में बदलाव की जरूरत बताई है. उन्होंने कहा कि पंजाब अब सिर्फ गेहूं और धान की खेती पर निर्भर नहीं रह सकता. किसानों की आय बढ़ाने, भूजल बचाने और खेती को टिकाऊ बनाने के लिए बागवानी, तिलहन और दलहन की फसलों को बढ़ावा देना जरूरी है.

डॉ. धालीवाल ने कहा कि हरित क्रांति के दौरान पंजाब ने देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. राज्य में गेहूं और धान का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, जिससे देश की जरूरतें पूरी करने में मदद मिली. लेकिन अब दूसरे राज्य भी इन फसलों का उत्पादन कर रहे हैं. ऐसे में पंजाब को अपनी कृषि व्यवस्था में बदलाव करना चाहिए और ऐसी फसलों पर ध्यान देना चाहिए, जिनमें पानी कम लगता है और किसानों को बेहतर आमदनी मिल सकती है.

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, डॉ. धालीवाल ने कहा कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ऐसी फसल किस्में विकसित कर रहा है, जिनमें पानी की कम जरूरत होती है और जिन्हें बारिश के मौसम में भी उगाया जा सकता है. विश्वविद्यालय बागवानी, तिलहन, दलहन, जैविक खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को भी बढ़ावा दे रहा है. उन्होंने कहा कि भारत अपनी जरूरत का करीब 55 से 56 फीसदी खाद्य तेल आयात करता है. ऐसे में देश में तिलहन की खेती का रकबा बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं. इससे खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

डॉ. धालीवाल ने कहा कि भूजल का लगातार गिरता स्तर पंजाब की खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. राज्य में करीब 41 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिसमें से 31 से 32 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है. गन्ना और वसंत ऋतु में उगाया जाने वाला मक्का भी ज्यादा पानी लेते हैं. उन्होंने कहा कि भूजल की कमी पर चर्चा करते समय उद्योगों में होने वाली पानी की खपत को भी ध्यान में रखना चाहिए. बारिश के पानी को जमा करके जमीन में पहुंचाने से भूजल स्तर को सुधारने में मदद मिल सकती है.

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. धालीवाल ने कहा कि फल और सब्जियों की खेती पंजाब के कृषि क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है. एक से दो हेक्टेयर जमीन वाले छोटे किसान सब्जियों की खेती से फायदा उठा सकते हैं. वहीं, 10 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन वाले किसान फलों के बाग लगाने पर विचार कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि पारंपरिक धान की खेती में लागत बढ़ रही है और मुनाफा घट रहा है. ऐसे में किसानों के लिए केवल धान की खेती पर निर्भर रहना धीरे-धीरे कम फायदेमंद होता जा रहा है.

जलवायु परिवर्तन पर डॉ. धालीवाल ने कहा कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ऐसी फसल किस्में विकसित कर रहा है, जो बदलते मौसम का सामना कर सकें. इन किस्मों का उद्देश्य मौसम में होने वाले बदलावों के कारण फसल उत्पादन पर पड़ने वाले बुरे असर को कम करना है. इससे किसानों को बदलती जलवायु की चुनौतियों से निपटने में मदद मिल सकती है.

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