एग्रीवेट: 26 सितंबर 2026, अहमदाबाद: गुजरात में कपास पर सफेद मक्खी और जड़ सड़न का खतरा, कृषि मौसम विभाग ने दी दवा की सलाह – गुजरात के दक्षिण और मध्य कपास बेल्ट में हाल की नमी और उमस भरे मौसम के चलते कपास की फसल पर चूसक कीट यानी सफेद मक्खी व तेला (जैसिड) के साथ-साथ फफूंद जनित जड़ सड़न और उकठा रोग का खतरा बढ़ गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अहमदाबाद केंद्र की कृषि मौसम परामर्श सेवा ने 19 सितंबर को जारी बुलेटिन संख्या 73/2026 में इसे लेकर किसानों को सतर्क करते हुए दवा व मात्रा की जानकारी दी है।
यह समस्या भरूच, सूरत, नर्मदा और तापी जिलों (माकतमपुर कृषि मौसम इकाई क्षेत्र, नवसारी कृषि विश्वविद्यालय) के साथ-साथ आणंद, छोटा उदयपुर, दाहोद, खेड़ा, महिसागर, पंचमहल और वडोदरा जिलों (आणंद कृषि मौसम इकाई क्षेत्र, आणंद कृषि विश्वविद्यालय) में देखी जा रही है। बुलेटिन के मुताबिक हाल की नमी और तापमान की स्थिति इन कीट-रोगों के फैलने के लिए अनुकूल बनी हुई है।
कपास की फसल में सफेद मक्खी और तेला जैसे चूसक कीट पत्तियों का रस चूसकर पौधे को कमजोर कर देते हैं, जिससे पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और बॉल यानी कपास की डोडी का विकास रुक जाता है। वहीं जड़ सड़न और उकठा रोग जमीन में नमी ज्यादा रहने पर फफूंद के जरिए फैलते हैं और पौधे को जड़ से मुरझा देते हैं, जिससे पूरा पौधा ही सूख सकता है।
सफेद मक्खी और तेला के गंभीर प्रकोप की स्थिति में फ्लोनिकामिड 50 डब्ल्यूजी की 3 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी या डायफेंथियूरॉन 50 डब्ल्यूपी की 10 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। जड़ सड़न और उकठा रोग की रोकथाम के लिए मैंकोजेब 75 डब्ल्यूपी की 27 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 40 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी या कार्बेन्डाजिम की 10 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में से किसी एक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह एडवाइजरी आईएमडी की माकतमपुर और आणंद स्थित कृषि मौसम फील्ड इकाइयों ने राज्य के कृषि विश्वविद्यालय नेटवर्क के सहयोग से जारी की है। किसानों को सलाह दी गई है कि छिड़काव से पहले खेत में नमी और कीट प्रकोप की स्थिति खुद जांच लें, क्योंकि हल्के प्रकोप में सामान्य निगरानी ही काफी हो सकती है, जबकि प्रकोप ज्यादा दिखने पर ही ऊपर बताई गई दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए।
खेत में पानी का जमाव रोकना, जल निकासी की उचित व्यवस्था करना और खेत को खरपतवार से मुक्त रखना भी जड़ सड़न व उकठा रोग से बचाव में मददगार माना गया है। साथ ही, एक ही दवा का बार-बार इस्तेमाल करने से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, इसलिए विशेषज्ञ अलग-अलग समूह की दवाओं को बदल-बदल कर इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं।
छिड़काव के लिए पानी की सही मात्रा का इस्तेमाल भी जरूरी माना गया है, क्योंकि कम पानी में दवा घोलने से पौधों पर असमान छिड़काव होता है और ज्यादा पानी में घोलने से दवा का असर कमजोर पड़ सकता है। किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि छिड़काव के तुरंत बाद बारिश की आशंका हो तो छिड़काव टाल दें, ताकि दवा बह न जाए और नुकसान न हो।