मावा-घी की मलिका भदावरी भैंस की वापसी, 3 साल में दोगुना हुआ कुनबा.. दूध में 14 फीसदी तक वसा – एग्रीवेट

atulpradhan
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एग्रीवेट: कभी गांवों की पहचान रही भदावरी भैंस अब फिर अपने पुराने मुकाम की ओर लौट रही है. देशी नस्ल की इस खास भैंस को बचाने के लिए मध्य प्रदेश के शिवपुरी में चल रहे भदावरी ब्रीडिंग सेंटर ने बड़ी सफलता हासिल की है. महज तीन साल में यहां भदावरी भैंसों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है. खास बात यह है कि इस नस्ल के दूध में 8 से 14 प्रतिशत तक वसा पाई जाती है, जिसके कारण मावा और घी बनाने वाले कारोबारियों के बीच इसकी खास मांग रहती है.

3 साल में दोगुना हुआ भदावरी भैंसों का कुनबा

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शिवपुरी के भदावरी ब्रीडिंग सेंटर की शुरुआत एक सीमित संख्या से हुई थी. साल 2023 में मध्य प्रदेश पशुधन एवं कुक्कुट  विकास बोर्ड उत्तर प्रदेश के इटावा से 21 भदावरी पड़ियां और एक पाड़ा लेकर आया था. बेहतर देखभाल, प्रजनन प्रबंधन और नस्ल संरक्षण की कोशिशों का असर अब दिखाई दे रहा है. तीन साल के भीतर केंद्र में भदावरी भैंसों की संख्या बढ़कर करीब 40 हो गई है. इस पहल का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं है. केंद्र शुद्ध भदावरी नस्ल के आनुवंशिक गुणों को सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने पर भी काम कर रहा है. इससे नस्ल संरक्षण के साथ किसानों और पशुपालकों के लिए भविष्य में बेहतर प्रजनन संसाधन उपलब्ध कराने की उम्मीद है.

दूध में 14 फीसदी तक फैट, मावा-घी के लिए खास

भदावरी भैंस  की सबसे बड़ी खासियत इसका दूध माना जाता है. इसके दूध में वसा की मात्रा करीब 8 से 14 प्रतिशत तक हो सकती है. यही वजह है कि मावा और घी तैयार करने वाले कारोबारियों के लिए इसका दूध बेहद उपयोगी माना जाता है. अधिक फैट होने से कम मात्रा के दूध से भी ज्यादा मात्रा में दुग्ध उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. भदावरी भैंस की पहचान इसके भूरे रंग और शरीर पर मौजूद सफेद निशानों से होती है. इसके गले पर सफेद रंग की दो धारियां होती हैं, जिन्हें स्थानीय तौर पर ‘सफेद कंठी’ कहा जाता है. यही विशेषताएं इसे दूसरी भैंस नस्लों से अलग पहचान देती हैं.

भदावर रियासत से मिला नस्ल को नाम

भदावरी भैंस का नाम ऐतिहासिक भदावर रियासत से जुड़ा है. यह नस्ल मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा, आगरा और बाह क्षेत्र तथा मध्य प्रदेश के भिंड और मुरैना जिलों में पाई जाती रही है. गर्म और अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों में पली-बढ़ी इस देसी नस्ल ने स्थानीय पशुपालकों के बीच लंबे समय तक अपनी अलग पहचान बनाए रखी. लेकिन समय के साथ शुद्ध भदावरी नस्ल का अस्तित्व कमजोर पड़ता गया. नस्ल संरक्षण की मौजूदा  कोशिशें इसी पारंपरिक आनुवंशिक विरासत को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं.

क्रॉस ब्रीडिंग से घटती गई संख्या

एक समय देश में भदावरी भैंसों की संख्या काफी अधिक थी. वर्ष 1977 में इनकी संख्या करीब 1.30 लाख बताई जाती है. लेकिन बाद में मुर्रा भैंस  के साथ अनियोजित क्रॉस ब्रीडिंग और शुद्ध भदावरी पाड़ों की कमी के कारण इनकी संख्या लगातार घटती गई. हालात ऐसे बने कि देश में शुद्ध भदावरी भैंसों की संख्या कुछ हजार तक सिमट गई. इससे इस विशिष्ट देसी नस्ल के अस्तित्व पर खतरा बढ़ गया. ऐसे समय में शिवपुरी का ब्रीडिंग सेंटर नस्ल संरक्षण की दिशा में उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है. अगर इसी तरह शुद्ध नस्ल के प्रजनन और संरक्षण को बढ़ावा मिलता रहा, तो भदावरी भैंस न सिर्फ विलुप्त होने से बच सकती है, बल्कि पशुपालकों के लिए दोबारा आय का मजबूत जरिया भी बन सकती है.

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