एग्रीवेट: Pulicat Lake: तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के बीच पुलिकट झील में मछली पकड़ने की सीमा को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है. अब इस समस्या को खत्म करने के लिए पुराने तरीके को छोड़कर तकनीक का सहारा लेने की तैयारी है. दोनों राज्यों के 25 मछुआरा गांवों के प्रतिनिधियों ने एक बैठक में सहमति जताई है कि झील में सीमा तय करने के लिए स्थायी GPS व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. मछुआरों का कहना है कि, अगर नावों में GPS लगाया जाए और सीमा पार करने पर तुरंत चेतावनी मिले, तो दोनों राज्यों के मछुआरों के बीच होने वाले विवाद और टकराव को काफी हद तक रोका जा सकता है.
पुलिकट झील में अभी तक सीमा की पहचान के लिए पारंपरिक तरीके अपनाए जाते रहे हैं. इसके लिए पानी में पाल्मायरा यानी ताड़ के पेड़ों के तनों का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन खारे पानी में ये तने ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते और धीरे-धीरे खराब हो जाते हैं. इस वजह से सीमा के निशान साफ नहीं रहते. मछुआरों को यह पता लगाने में परेशानी होती है कि किस राज्य के इलाके में वे मछली पकड़ रहे हैं. यही बात कई बार विवाद की वजह बन जाती है. अब मछुआरा प्रतिनिधियों ने कहा है कि पानी में ऐसे स्थायी निशान लगाने के बजाय GPS के जरिए डिजिटल सीमा तय की जाए.
प्रस्ताव के मुताबिक पुलिकट झील में चलने वाली मोटर वाली और पारंपरिक नावों पर जीपीएस ट्रांसपोंडर लगाए जाएंगे. इससे हर नाव की लोकेशन पर नजर रखी जा सकेगी. राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र जैसी संस्थाएं डिजिटल तरीके से समुद्री सीमा की सही जगह तय कर सकती हैं. अगर कोई नाव सीमा के पास पहुंचती है या उसे पार करती है तो नाव पर तुरंत अलर्ट मिलेगा. इसकी जानकारी तिरुवल्लूर और तिरुपति के समुद्री पुलिस कंट्रोल रूम को भी मिल जाएगी. इससे सीमा को लेकर होने वाला भ्रम कम होगा और समय रहते नाव को वापस लौटने के लिए कहा जा सकेगा.
पुलिकट झील में मछली पकड़ने की सीमा को लेकर विवाद नया नहीं है. मछुआरा प्रतिनिधियों ने बैठक में करीब एक दशक से चले आ रहे तनाव का मुद्दा भी उठाया. अप्रैल 2014 में तमिलनाडु के चिन्ना मंगोडु गांव में एक हिंसक घटना हुई थी. उस दौरान घरों, नावों और मछली पकड़ने के जालों को आग लगाए जाने की बात सामने आई थी. इसके बाद दोनों राज्यों के मछुआरों के बीच तनाव और बढ़ गया. बताया गया कि तमिलनाडु के मछुआरों के खिलाफ करीब 199 पुलिस मामले अब भी लंबित हैं.
इसी डर की वजह से स्थानीय मछुआरे करीब 10 साल से आंध्र प्रदेश के अधिकार क्षेत्र वाले पानी में जाने से बचते रहे हैं. मछुआरा प्रतिनिधियों का कहना है कि स्थायी शांति के लिए दोनों राज्य सरकारों को इन पुराने मामलों पर तेजी से फैसला लेना होगा या आपसी सहमति से इन्हें वापस लेने पर विचार करना होगा.
पुलिकट झील की समस्या सिर्फ सीमा विवाद तक सीमित नहीं है. झील में गाद जमा होने और गर्मियों में पानी कम होने से समुद्र से मछलियों के आने-जाने का रास्ता कई बार प्रभावित होता है. इससे झील के अंदर मछलियों की संख्या और मछुआरों की कमाई पर असर पड़ता है. जब मछलियां कम होती हैं तो दोनों राज्यों के मछुआरों के बीच सीमित पानी में मछली पकड़ने को लेकर तनाव बढ़ जाता है. इसी समस्या को देखते हुए समुद्र से झील के जुड़ाव वाले मुहाने को खोलने और उसे बेहतर बनाए रखने की योजना पर भी काम चल रहा है.
तिरुपति के सांसद मडिला गुरु मूर्ति की मांग के बाद केंद्रीय मत्स्य मंत्रालय ने रायडोरुवु समुद्री मुहाने को खोलने और स्थिर करने के लिए 133.11 करोड़ रुपये की परियोजना शुरू की है. उम्मीद है कि समुद्री मुहाना खुलने से समुद्र का पानी और मछलियों की आवाजाही बेहतर होगी. इससे झील में मछलियों की उपलब्धता बढ़ सकती है और दोनों राज्यों के मछुआरों के बीच मछली पकड़ने की जगह को लेकर होने वाला तनाव भी कम हो सकता है.
इस पूरी योजना में GPS निगरानी, पुराने मामलों के समाधान और झील में मछलियों की उपलब्धता बढ़ाने जैसे कदमों को साथ लेकर चलने पर जोर दिया जा रहा है. बैठक में दोनों राज्यों के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने भी इस दिशा में काम करने पर चर्चा की.