पराली बेचकर कमाई कर रहे हरियाणा के किसान, चारा उद्योग को कर रहे सप्लाई.. प्रदूषण पर लगेगा ब्रेक! – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: हरियाणा के करनाल जिले में धान की कटाई तेजी से चल रही है. इस बीच किसान पराली जलाने के बजाय उसे चारे के रूप में बेच रहे हैं. कुछ किसान पराली को उद्योगों में भी सप्लाई कर रहे हैं. इससे किसानों को अतिरिक्त कमाई हो रही है. साथ ही, पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में भी मदद मिल रही है. कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के मुताबिक, करनाल जिले में बासमती और गैर-बासमती धान की खेती कुल 4,29,770 एकड़ में हुई है. इसमें से करीब 2.25 लाख एकड़ में धान की कटाई हो चुकी है. वहीं, 1.95 लाख एकड़ में फसल अवशेषों का प्रबंधन किया जा चुका है.

फसल अवशेष प्रबंधन के तहत 35 फीसदी पराली का निपटारा खेतों में ही किया गया. इस तरीके में पराली को खेत में ही रखकर उसका प्रबंधन किया जाता है. वहीं, 65 फीसदी पराली को खेतों से इकट्ठा करके बाहर ले जाया गया. इसका इस्तेमाल चारे और उद्योगों में किया जा सकता है. कृषि विभाग के उप निदेशक डॉ. जसविंदर सिंह ने ट्रिब्यून को बताया कि करनाल जिले में पराली प्रबंधन के लिए पर्याप्त मशीनें उपलब्ध  हैं. ज्यादातर किसान धान की कटाई के लिए ऐसी कंबाइन मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनमें पराली प्रबंधन की व्यवस्था होती है. इससे खेत में ही फसल अवशेषों का प्रबंधन किया जा सकता है. जिन किसानों के पास ऐसी व्यवस्था नहीं है, वे पराली को खेत से बाहर निकालकर उसका प्रबंधन कर रहे हैं.

डॉ. जसविंदर सिंह ने कहा कि किसान पराली को बंडल और गांठों के रूप में बेच रहे हैं. इसका इस्तेमाल पशुओं के चारे और उद्योगों में किया जा रहा है. इससे वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिल रही है और किसानों को अतिरिक्त कमाई भी हो रही है. उन्होंने बताया कि जिले में पराली प्रबंधन के लिए 8,472 मशीनें काम कर रही हैं. इनमें खेत में ही पराली का प्रबंधन करने के लिए 3,378 सुपर सीडर और पराली को इकट्ठा कर गांठ बनाने के लिए 422 बेलर मशीनें शामिल हैं. इन मशीनों वाले किसान आसपास के खेतों से भी पराली इकट्ठा करने में मदद कर रहे हैं. वे पराली को दबाकर गांठें बनाते हैं और फिर उन्हें बाजार में बेच देते हैं.

करनाल जिले के निगधू गांव के प्रगतिशील किसान विक्रम राणा ने कहा कि वह दूसरे किसानों के खेतों से पराली इकट्ठा कर उसे अपने केंद्र पर लाते हैं. इसके बाद पराली को बेच दिया जाता है. अब तक वह करीब 500 एकड़ खेतों से पराली का प्रबंधन कर चुके हैं. उन्होंने बताया कि वह किसानों से इस काम के लिए कोई शुल्क नहीं लेते, बल्कि पराली बेचकर कमाई करते हैं. व्यवस्था के अनुसार, पराली की बिक्री से प्रति एकड़ 10,000 से 15,000 रुपये तक मिल जाते हैं.

वहीं, निसिंग के किसान अनिल के पास दो बेलर मशीनें हैं. वह अपने खेतों के साथ दूसरे किसानों के खेतों से भी पराली इकट्ठा करते हैं. एक अन्य किसान जोगिंदर ने बताया कि पहले पराली का प्रबंधन करने के विकल्प कम थे, लेकिन अब इसे चारे और उद्योगों में इस्तेमाल के लिए बेचा जा रहा है. इससे उन्हें प्रति एकड़ करीब 8,000 रुपये की अतिरिक्त कमाई हो रही है. साथ ही, खेत साफ रहते हैं और पर्यावरण को भी नुकसान कम होता है.

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