हिमाचल में सेब की फसल पर मौसम की मार, उत्पादन 48% गिरा; मंडियों में पहुंचीं सिर्फ 1.15 करोड़ पेटियां – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 03 अक्टूबर 2026, भोपाल: हिमाचल में सेब की फसल पर मौसम की मार, उत्पादन 48% गिरा; मंडियों में पहुंचीं सिर्फ 1.15 करोड़ पेटियां – हिमाचल प्रदेश में इस साल सेब की फसल पर मौसम की मार पड़ी है। जलवायु परिवर्तन, बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और बर्फबारी से फसल को भारी नुकसान हुआ है। इसके चलते इस साल अब तक सेब उत्पादन में करीब 48 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। राज्य में सेब उत्पादन 10-12 साल के निचले स्तर पर पहुंचने की आशंका है।

राज्य के बागवानी निदेशक सतीश कुमार ने गुरुवार को बताया कि इस साल अब तक 1.15 करोड़ सेब की पेटियां बाजार पहुंच चुकी हैं। पिछले साल इसी अवधि में 2.18 करोड़ पेटियां बाजार पहुंची थीं। इस तरह इस साल बाजार पहुंचने वाली पेटियों की संख्या में करीब 48 फीसदी की कमी आई है।

बागवानी विभाग के मुताबिक, इस साल हिमाचल में कुल सेब उत्पादन करीब 1.5 करोड़ पेटियां रहने का अनुमान है। पिछले साल सेब का उत्पादन 7 लाख मीट्रिक टन था, जबकि इस साल यह घटकर 3.5 लाख से 3.75 लाख मीट्रिक टन के बीच रहने की उम्मीद है। हिमाचल का सेब कारोबार करीब ₹5,000 करोड़ की अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। राज्य में करीब 2.5 लाख परिवार सेब की खेती करते हैं। सेब राज्य के बागवानी क्षेत्र का प्रमुख आधार है। उत्पादन में कमी का असर किसानों के साथ राज्य के GDP पर भी पड़ने की बात कही गई है।

बता दें, हिमाचल प्रदेश में सेब का सीजन 15 जून से अक्टूबर के अंत तक चलता है। शुरुआती किस्मों के सेब जून के अंत तक बाजार में आने लगते हैं। वहीं ऊंचाई वाले इलाकों और जनजातीय क्षेत्रों से सेब की आवक अक्टूबर के अंत तक जारी रहती है।

सेब उत्पादन में कमी का असर Market Intervention Scheme (MIS) के तहत होने वाली खरीद पर भी पड़ा है। अब तक MIS के तहत सिर्फ 10,462 मीट्रिक टन सेब खरीदा गया है। पिछले साल इसी तारीख तक 76,674 मीट्रिक टन सेब की खरीद हो चुकी थी। सेब का आकार छोटा रहने से भी खरीद प्रभावित हुई है। इसके कारण HPMC को जूस और दूसरे उत्पाद तैयार करने के लिए कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ रहा है।

बागवानी निदेशक सतीश कुमार ने बागवानों से आगामी सीजन के लिए ‘Restructured Weather-Based Insurance Scheme’ में बड़ी संख्या में नामांकन कराने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ओलावृष्टि, कम तापमान और मौसम से जुड़े अन्य कारणों से होने वाले नुकसान की भरपाई में यह योजना मददगार हो सकती है। उन्होंने कहा कि अब केवल पारंपरिक बागवानी तरीके पर्याप्त नहीं होंगे। पुराने बागों में उत्पादन लगातार कम हो रहा है। ऐसे में विभाग हाई-डेंसिटी प्लांटेशन को बढ़ावा दे रहा है।

विभाग के अनुसार, करसोग में करीब 1,00,000 से 1,50,000 हाई-डेंसिटी पौधे तैयार किए जा रहे हैं। इन्हें अलग-अलग ऊंचाई वाले क्षेत्रों के हिसाब से लगाया जाएगा। उधर,  प्रदेश के राजस्व एवं बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि इस बार सेब उत्पादन काफी कम है। ऐसे में यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि सीजन खत्म होने तक कुल उत्पादन 2 करोड़ पेटियों तक पहुंच पाएगा या नहीं।

पिछले साल करीब 3.49 करोड़ पेटियां बाजार पहुंची थीं। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार Market Intervention Scheme (MIS) के तहत सेब का खरीद मूल्य बढ़ाने की तैयारी कर रही है। बागवानों को कुछ राहत देने के लिए इस संबंध में प्रस्ताव आगामी कैबिनेट में पेश किया जाएगा।

बागवानों के मुताबिक, इस साल ऊपरी शिमला के क्षेत्रों में सेब की फसल बेहद खराब रही। ओलावृष्टि ने भी बागों को भारी नुकसान पहुंचाया है। सेब उत्पादक प्रेमराज धरटा ने बताया कि ओलावृष्टि के साथ खाद, स्प्रे, मजदूरी और पैकिंग पेटियों की लागत भी बढ़ गई है। संधू क्षेत्र के बागवान सुजात चौहान ने बताया कि जो बागवान पहले सालाना 1,000 से 1,200 पेटियां सेब पैदा करते थे, उनका उत्पादन इस साल घटकर सिर्फ 300-400 पेटियां रह गया है। ओलावृष्टि से बड़ी मात्रा में फसल नष्ट हुई है।

बागवान हरदयाल रोल्टा ने कहा कि खाद, स्प्रे और पैकिंग पेटियों के कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के साथ कीटनाशकों की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता है। यह पता लगाना मुश्किल होता है कि कीटनाशक असली हैं या नकली। इसके अलावा मजदूरी भी महंगी हो गई है। इन परिस्थितियों में बागानों की सालाना संचालन लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

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