एग्रीवेट: अनियमित बारिश, बदलते मौसम और सूखे जैसी स्थितियों के बीच किसानों के लिए राहत की खबर है. कर्नाटक के धारवाड़ स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (UAS) ने किसानों के लिए 14 नई फसल किस्में विकसित की हैं. इन किस्मों को कम पानी में अच्छी पैदावार देने और बदलते मौसम का सामना करने के लिए तैयार किया गया है. इससे अनियमित बारिश, सूखे जैसी स्थिति और बढ़ते कीट प्रकोप से किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है. नई किस्मों में मोटे अनाज, अनाज, दलहन, तिलहन और कपास शामिल हैं. इन किस्मों को 25 से 28 सितंबर तक होने वाले कृषि मेला-2026 में किसानों से परिचित कराया जाएगा.
UAS के कुलपति प्रो. एनबी प्रकाश ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि इन किस्मों का अलग-अलग जगहों पर परीक्षण किया गया है. परीक्षण में इनसे बेहतर पैदावार, सूखे को सहने की क्षमता और रोगों से बचाव के अच्छे परिणाम मिले हैं. इन फसलों की अवधि भी कम है, जिससे ये बदलती जलवायु के हिसाब से किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं.
UAS धारवाड़ की विकसित नई किस्मों में ज्वार की हाइब्रिड DSH-6 शामिल है. इससे मौजूदा हाइब्रिड की तुलना में करीब 19 फीसदी ज्यादा अनाज उत्पादन मिलता है. इसमें चारे की पैदावार भी अधिक होती है, इसलिए यह अनाज और चारे दोनों के लिए उपयोगी है. यह फसल करीब 105 दिन में तैयार हो जाती है, जिससे किसान जल्दी कटाई कर सकते हैं. वहीं, मक्का की हाइब्रिड GH 21547 करीब 82 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देती है. यह बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली धर्मा किस्म से करीब 15 फीसदी ज्यादा है. वहीं, मूंग की DGG-9 किस्म से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिल सकता है. यह मौजूदा DGG-1 किस्म से बेहतर प्रदर्शन करती है.
तिलहनों में सोयाबीन की DSb-7 किस्म भी विकसित की गई है. इसमें ज्यादा उत्पादन के साथ सोयाबीन रस्ट रोग से बचाव की क्षमता है. इस किस्म में करीब 38 फीसदी प्रोटीन और 22 फीसदी तेल पाया जाता है. इससे इसका पोषण और व्यावसायिक महत्व दोनों बढ़ जाता है. साथ ही UAS धारवाड़ ने किसानों के लिए सूरजमुखी, नाइजर, गेहूं, कुसुम और बाजरे की नई किस्में भी विकसित की हैं. इनमें कई किस्में कम बारिश और सूखे जैसे हालात वाले क्षेत्रों में बेहतर उत्पादन देने के लिए तैयार की गई हैं.
सूरजमुखी की KBSH-88 हाइब्रिड किस्म 84 दिन में तैयार हो जाती है. यह वर्षा आधारित और अर्ध-शुष्क इलाकों के लिए उपयुक्त है. इसमें डाउनी मिल्ड्यू रोग से बचाव की क्षमता है और करीब 59.4 फीसदी ओलिक एसिड पाया जाता है.. इससे यह खाद्य तेल उत्पादन के लिए उपयोगी हो सकती है. नाइजर की DNV-2 किस्म में अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट रोग के प्रति बेहतर प्रतिरोध है और वर्षा आधारित खेती में स्थिर उत्पादन देने की क्षमता है.
रबी सीजन के लिए UAS ने गेहूं की दो उन्नत किस्में DWB-20 और DWB-18 विकसित की हैं. DWB-20 पत्ती और तना रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोधी है और इसकी पैदावार 3,521 किलो प्रति हेक्टेयर तक है. इससे अच्छी गुणवत्ता की रोटी और बेकरी उत्पाद बनाए जा सकते हैं. वहीं, DWB-18 में 14.2 फीसदी प्रोटीन पाया जाता है. कुसुम की नई किस्म DSAF-2 करीब 130 दिन में तैयार होती है. इसकी पैदावार क्षमता 1,920 किलो प्रति हेक्टेयर है. इससे रबी सीजन में किसानों को एक और तिलहन फसल का विकल्प मिलेगा.
पोषक और जलवायु अनुकूल फसलों को बढ़ावा देने के लिए UAS ने बाजरे की दो नई किस्में भी विकसित की हैं. DPMH-4 हाइब्रिड से 2,852 किलो प्रति हेक्टेयर तक अनाज उत्पादन दर्ज किया गया है. वहीं, ब्राउन टॉप मिलेट की DBTM-1 किस्म से अनाज के साथ चारा भी मिलता है. यह सूखे और कम बारिश वाले क्षेत्रों की खेती के लिए उपयोगी हो सकती है.
UAS धारवाड़ ने सरसों की TDM-305 और देसी कपास की DhCV-1 किस्म भी विकसित की है. DhCV-1 की उत्पादन क्षमता 778 किलो प्रति हेक्टेयर तक है. यह उत्तर कर्नाटक की कृषि और मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है. UAS के कुलपति प्रो. प्रकाश ने कहा कि नई किस्मों से फसल उत्पादन बढ़ाने और पानी की बचत में मदद मिल सकती है. इन किस्मों को बदलते मौसम और जलवायु से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है. इससे किसानों को बेहतर उत्पादन के साथ पोषण और आर्थिक लाभ बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है.