नागालैंड के किसान ने बांस और पुराने डिब्बों से बनाया सोलर ड्रायर, सैकड़ों किसानों की आय बढ़ी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 04 नवंबर 2026, फेक, (नागालैंड): नागालैंड के किसान ने बांस और पुराने डिब्बों से बनाया सोलर ड्रायर, सैकड़ों किसानों की आय बढ़ी – नागालैंड के फेक जिले के पोर्बा गांव में स्वुयेवेज़ो द्ज़ूदो ने बिजली के बिना चलने वाला एक सोलर ड्रायर तैयार किया है, जिससे फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने में क्षेत्र के सैकड़ों किसानों को मदद मिल रही है। दीमापुर के सेंट जोसेफ विश्वविद्यालय से बॉटनी में स्नातकोत्तर करने के बाद द्ज़ूदो शहर की नौकरी छोड़कर गांव लौटे थे।

गांव में उन्होंने देखा कि कटाई के बाद उपज अक्सर बिकने से पहले ही खराब हो जाती थी। पारंपरिक धूप में सुखाने का तरीका बारिश, धूल और कीटों के कारण भरोसेमंद नहीं था, और बिजली की अनियमित सप्लाई के चलते बिजली से चलने वाले ड्रायर भी विकल्प नहीं थे।

इस समस्या के समाधान के लिए द्ज़ूदो ने कृषि विज्ञान केंद्र फेक और किरात बायोटेक के मणिश चौधरी की तकनीकी मदद से एक सोलर ड्रायर विकसित किया। इसमें बांस व लकड़ी के फ्रेम, पारदर्शी कांच, यूवी शीट और पुराने एल्युमीनियम बीयर के डिब्बों का सौर ऊष्मा संग्राहक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। बुनियादी ड्रायर की लागत करीब 7,000 रुपये है, जबकि सामुदायिक इकाइयां 25,000 से 30,000 रुपये में बन जाती हैं।

पूरी तरह बिजली से मुक्त यह ड्रायर मौसम और फसल के आधार पर दो से तीन दिनों में 50 से 100 किलोग्राम तक उपज सुखा सकता है। इससे सूखे कीवी स्लाइस, हल्दी पाउडर, अदरक चिप्स और बांस की शूट से बने फ्लेक्स जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। शुरुआती झिझक को डेमो और प्रशिक्षण के ज़रिए दूर किया गया और मौखिक प्रचार से यह तकनीक धीरे-धीरे फैली।

2025 के मध्य तक पोर्बा, थुवोपिसु, ज़ुलहामी, रुंगुज़ु और सिएपोकेटा समेत पांच गांवों में 25 से अधिक सोलर ड्रायर लग चुके थे, जिससे लगभग 500 किसान प्रभावित हुए। किसानों का दावा है कि इससे उनकी आय में 30 से 40 प्रतिशत तक सुधार हुआ है। द्ज़ूदो की अपनी सालाना आय करीब 6 से 7 लाख रुपये बताई गई है। उनके इस काम के लिए उन्हें नई दिल्ली में पूसा कृषि विज्ञान मेले में आईएआरआई इनोवेटिव फार्मर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

नागालैंड के पहाड़ी इलाकों में छोटे किसानों के लिए कटाई के बाद होने वाला नुकसान हमेशा एक बड़ी समस्या रहा है, क्योंकि सड़क संपर्क सीमित होने और बाज़ार दूर होने के कारण ताज़ा उपज को समय पर बेचना मुश्किल होता है। बिजली न होने और नमी भरे मौसम के कारण पहले किसानों के पास सुखाने का कोई भरोसेमंद तरीका नहीं था, जिससे कीवी, अदरक और हल्दी जैसी नकदी फसलों का बड़ा हिस्सा हर साल बर्बाद हो जाता था।

द्ज़ूदो के ड्रायर को कृषि विज्ञान केंद्र फेक और नागालैंड विश्वविद्यालय के एग्री बायोटेक फाउंडेशन का भी समर्थन मिला है। कुछ इकाइयां कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व यानी सीएसआर परियोजनाओं के तहत मुफ्त बांटी गई हैं, जबकि कुछ गांवों में किसानों ने आपस में चंदा जोड़कर सामुदायिक इकाइयां खड़ी की हैं।

द्ज़ूदो का कहना है कि प्रयोग करने के लिए किसी बड़ी प्रयोगशाला की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि देखने, सोचने और करने की क्षमता चाहिए। वे आगे विकेंद्रीकृत ग्रामीण उद्यम मॉडल के तहत और गांवों में सोलर ड्रायर इकाइयां लगाने, किसानों के लिए प्रशिक्षण केंद्र बनाने, बाज़ार से सीधा जुड़ाव कराने और घरेलू उपयोग के लिए छोटे आकार के ड्रायर के साथ-साथ सोलर पॉलीहाउस खेती की दिशा में भी काम करने की योजना बना रहे हैं।

पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों में बिजली की पहुंच अब भी सीमित है और सड़क संपर्क कमज़ोर होने के कारण उपज को समय पर बाज़ार तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बना रहता है। ऐसे में द्ज़ूदो जैसी सस्ती, स्थानीय सामग्री से बनी तकनीक न सिर्फ उनके अपने गांव, बल्कि नागालैंड और आसपास के पहाड़ी राज्यों के दूसरे गांवों के लिए भी एक व्यावहारिक नमूना बन सकती है। कृषि विस्तार अधिकारियों का मानना है कि अगर ऐसी छोटी, कम लागत वाली तकनीकों को सरकारी योजनाओं के ज़रिए और बड़े स्तर पर बढ़ाया जाए, तो पहाड़ी इलाकों में कटाई के बाद होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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