एग्रीवेट: गाय-भैंस पालने वाले पशुपालकों के लिए राहत भरी खबर है. अब पशुओं की अचानक मौत या स्थाई दिव्यांगता से होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई बीमा के जरिए की जा सकेगी. खास बात यह है कि पशुधन बीमा का 85 प्रतिशत प्रीमियम सरकार देगी, जबकि पशुपालकों को केवल 15 प्रतिशत हिस्सा देना होगा. उत्तर प्रदेश सरकार नेशनल लाइवस्टॉक मिशन के तहत मुख्यमंत्री जोखिम प्रबंधन एवं पशुधन बीमा योजना सभी जिलों में संचालित कर रही है. इस योजना में गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूकर और भारवाहक पशुओं को भी शामिल किया गया है.
मुख्यमंत्री जोखिम प्रबंधन एवं पशुधन बीमा योजना का उद्देश्य पशुपालकों को आर्थिक सुरक्षा देना है. योजना के तहत बीमित पशु की आकस्मिक मृत्यु होने पर निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद 21 दिनों के भीतर दावा राशि सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजने का प्रावधान है. वहीं, पशु के पूर्ण स्थाई दिव्यांग होने पर बीमित राशि का 75 प्रतिशत तक भुगतान किया जा सकता है. अगर पशुपालक अपना बीमित पशु बेचता है, तो 100 रुपये शुल्क देकर वैध बीमा अवधि के लिए पॉलिसी नए खरीदार के नाम हस्तांतरित कराई जा सकती है. पशुपालक मोबाइल पर मिले लिंक से अपनी बीमा पॉलिसी भी प्राप्त कर सकते हैं.
योजना के तहत पशुओं की उम्र और निर्धारित अधिकतम मूल्य के आधार पर प्रीमियम तय किया गया है. एक साल के बीमा में बिना पूर्ण स्थाई दिव्यांगता (PTD) कवर के दुधारू गाय के लिए पशुपालक का अंश 133 रुपये और भैंस के लिए 177 रुपये बताया गया है.
बीमा की कुल वार्षिक प्रीमियम दर बिना PTD कवर के 2.95 प्रतिशत और PTD सहित 3.95 प्रतिशत निर्धारित है. बीमा कंपनी एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड है.
योजना के तहत प्रति परिवार पशुओं के बीमा की सीमा भी तय की गई है. बड़े पशुओं की श्रेणी में स्वदेशी और संकर दुधारू पशुओं के साथ घोड़ा, गधा, खच्चर, ऊंट, टट्टू, भैंसा और सांड शामिल हैं. इनके लिए अधिकतम 10 पशु इकाई प्रति परिवार की सीमा निर्धारित है. वहीं, सूकर के लिए 50 पशु इकाई और बकरी-भेड़ के लिए 100 पशु इकाई तक बीमा कराने का प्रावधान है. सूकर की 50 इकाइयां पांच बड़ी पशु इकाइयों और बकरी-भेड़ की 100 इकाइयां 10 बड़ी पशु इकाइयों के बराबर मानी गई हैं.
पशुपालक अपने नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सालय में संपर्क करके योजना का लाभ ले सकते हैं. बीमा कराने से पहले पशु की नस्ल, उम्र, स्वास्थ्य, दूध उत्पादन, उत्पादकता और स्थानीय बाजार मूल्य के आधार पर उसका मूल्यांकन किया जाएगा. इसमें मौसम और अन्य स्थानीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जा सकता है. बीमित पशु की पहचान के लिए यूनिक टैग लगाया जाएगा. यह प्रक्रिया पंजीकृत पशु चिकित्सक, पशुधन प्रसार अधिकारी, पशु चिकित्सा फार्मासिस्ट या कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता के माध्यम से पूरी की जा सकती है. पशुपालकों को सलाह दी गई है कि वे बीमा कराने से पहले पात्रता, प्रीमियम और पॉलिसी की शर्तों की जानकारी जरूर लें. साथ ही पशु का टैग नंबर और बीमा दस्तावेज सुरक्षित रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर दावा करने में परेशानी न हो.