एग्रीवेट: मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में केन नदी के किनारे रहने वाले सैकड़ों आदिवासी परिवार केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का विरोध कर रहे हैं. इन लोगों का कहना है कि बांध बनने और पानी बढ़ने से उनके गांव और घर डूब रहे हैं. कई परिवारों की जमीन पर भी असर पड़ा है. ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार ने जमीन के लिए मुआवजा तो दिया है, लेकिन टूटे घरों और दूसरे नुकसान की भरपाई नहीं हुई है. ऐसे में लोगों के सामने रहने और परिवार पालने का संकट खड़ा हो गया है. वहीं, सरकार का कहना है कि इस परियोजना से सूखे से परेशान बुंदेलखंड के किसानों को सिंचाई और पीने का पानी मिलेगा.
केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना केंद्र सरकार की एक बड़ी योजना है. इसका उद्देश्य देश की नदियों को आपस में जोड़कर पानी की कमी वाले इलाकों तक पानी पहुंचाना है. इस योजना के तहत मध्य प्रदेश की केन नदी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी से जोड़ा जा रहा है. यह परियोजना देश की करीब 30 नदियों को जोड़ने की बड़ी योजना का पहला चरण है.
सरकार का मानना है कि नदियों को जोड़ने से उन इलाकों को फायदा होगा, जहां बारिश कम होने के कारण पानी की कमी रहती है. इससे किसानों को खेतों की सिंचाई के लिए पानी मिल सकेगा. साथ ही लोगों को पीने का पानी और बिजली बनाने में भी मदद मिलेगी. लेकिन इस परियोजना को लेकर पन्ना जिले के कई गांवों में नाराजगी है. ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर उनसे उनकी पुश्तैनी जमीन और घर छिन रहे हैं. उनका आरोप है कि परियोजना शुरू करने से पहले उनकी समस्याओं को ठीक से नहीं सुना गया.
केन नदी के आसपास रहने वाले कई आदिवासी परिवार पीढ़ियों से यहां खेती करते आ रहे हैं. उनके लिए जमीन सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि उनके परिवार और जीवन से जुड़ी पहचान भी है. कई परिवारों का कहना है कि उनके पूर्वजों ने इसी जमीन पर खेती की और अब उनके बच्चों का भविष्य भी इसी पर निर्भर है. प्रदर्शन कर रही बिट्टी बाई कोंदार भी ऐसे ही परिवार से आती हैं. वह अपने परिवार के साथ लंबे समय से इस इलाके में रह रही हैं. उनके चार बेटे भी इस आंदोलन में शामिल हैं. बिट्टी बाई का कहना है कि परियोजना के कारण उनके गांव में पानी बढ़ गया है और उनके रहने की जगह पर संकट खड़ा हो गया है.
विरोध जताने के लिए कई महिलाएं नदी के पानी में उतरकर प्रदर्शन कर रही हैं. कुछ महिलाएं प्रतीक के तौर पर अर्थी पर लेट रही हैं. उनका कहना है कि अगर उन्हें उचित मुआवजा और रहने के लिए दूसरी जगह नहीं मिली, तो वे अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़कर नहीं जाएंगी. इन प्रदर्शनों के जरिए ग्रामीण सरकार का ध्यान अपनी परेशानी की ओर खींचना चाहते हैं.
ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत मुआवजे को लेकर है. उनका कहना है कि जमीन के बदले पैसा मिलने के बावजूद घर टूटने और दूसरी चीजों के नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हुई है. ऐसे में वे उस पैसे से अपनी जिंदगी दोबारा शुरू नहीं कर पा रहे हैं. बिट्टी बाई कोंदार का कहना है कि सरकार ने उनकी जमीन के लिए मुआवजा दिया, लेकिन घरों के नुकसान का पूरा पैसा नहीं मिला. उन्होंने बताया कि कुछ परिवारों को रहने के लिए अपना घर छोड़ना पड़ा है. ऐसे में उनके सामने यह सवाल है कि वे अपने बच्चों को लेकर कहां जाएं और नए सिरे से जीवन कैसे शुरू करें.
वहीं, स्थानीय महिला रामकली प्रजापति का कहना है कि अगर उनके घर तोड़े गए हैं, तो उन्हें इतना मुआवजा मिलना चाहिए कि वे दूसरी जगह घर बना सकें. उनका कहना है कि ग्रामीण सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए और उनके नुकसान की सही भरपाई हो. प्रदर्शन कर रहे लोगों का यह भी आरोप है कि परियोजना को लेकर गांव के लोगों से उनकी समस्याओं और जरूरतों के बारे में ठीक से चर्चा नहीं की गई. उन्हें डर है कि अगर पानी का स्तर बढ़ता रहा, तो कई और घर और गांव प्रभावित हो सकते हैं.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पन्ना जिले में केन नदी के किनारे प्रभावित लोगों को सरकार की ओर से कम से कम 12.5 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजा देने की बात कही गई है. इससे पहले मुआवजे की शुरुआती राशि 5 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर थी. बाद में इसे बढ़ाया गया. पन्ना की जिला अधिकारी उषा परमार के मुताबिक, करीब 90 प्रतिशत लोगों को मुआवजा दिया जा चुका है. उन्होंने कहा कि प्रशासन की टीमें गांव-गांव जाकर लोगों से जानकारी जुटा रही हैं. जिन लोगों की उम्र साल 2024 में 18 साल हुई है, उनकी जानकारी भी जुटाई जा रही है, ताकि नियमों के अनुसार उन्हें मुआवजा दिया जा सके.
परियोजना के तहत बांध, जलाशय और नहरें बनाई जा रही हैं. इनके जरिए पानी को एक नदी से दूसरी नदी तक पहुंचाने की योजना है. मध्य प्रदेश सरकार के एक इंजीनियर और परियोजना से जुड़े अधिकारी आमिर खान के मुताबिक, केन नदी को बेतवा नदी से करीब 230 किलोमीटर लंबे रास्ते से जोड़ने की योजना है. इससे बुंदेलखंड के सूखे इलाकों तक पानी पहुंचाने और खेती में मदद मिलने की उम्मीद है.
बुंदेलखंड में पानी की कमी का सीधा असर खेती पर पड़ता है. कई किसानों को बारिश के भरोसे खेती करनी पड़ती है. अगर समय पर बारिश नहीं होती, तो फसलों की पैदावार घटने का खतरा बढ़ जाता है. सिंचाई की सुविधा नहीं होने से किसान साल में कई फसलें भी नहीं उगा पाते. सरकार का कहना है कि केन-बेतवा परियोजना से इस समस्या को कम करने में मदद मिलेगी. नहरों और जलाशयों के जरिए खेतों तक पानी पहुंचाया जा सकेगा. इससे किसानों को फसलों की सिंचाई के लिए बेहतर सुविधा मिलने की उम्मीद है. इसके अलावा, इलाके के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराने और बिजली बनाने में भी मदद मिल सकती है.
हालांकि, इस परियोजना का फायदा किसानों तक कितना पहुंचेगा, यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि पानी का सही तरीके से बंटवारा कैसे होता है और सिंचाई की सुविधाएं कितनी अच्छी तरह विकसित की जाती हैं.
परियोजना को लेकर पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं भी सामने आई हैं. आलोचकों का कहना है कि बांध और जलाशय बनने से जंगल के बड़े हिस्से में पानी भर सकता है. इससे पेड़-पौधों और जंगली जानवरों के रहने की जगह पर असर पड़ने का डर है. पन्ना का इलाका अपने जंगलों और वन्यजीवों के लिए भी जाना जाता है. ऐसे में पर्यावरण से जुड़े लोगों की चिंता है कि परियोजना के कारण जंगल और प्राकृतिक जीवन को नुकसान पहुंच सकता है. उनका कहना है कि पानी की समस्या दूर करने के साथ-साथ जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है.
वहीं, सरकार की ओर से इस परियोजना को बुंदेलखंड में पानी की कमी दूर करने के एक अहम उपाय के रूप में पेश किया गया है. सरकार के मुताबिक, इससे सिंचाई, पीने के पानी और बिजली की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी.
अब देखना होगा कि सरकार ग्रामीणों की मांगों पर क्या कदम उठाती है. अगर प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, सुरक्षित घर और अपनी बात रखने का मौका मिलता है, तो उनकी परेशानी कम हो सकती है. साथ ही, यह भी जरूरी है कि परियोजना से मिलने वाले पानी का लाभ किसानों और आम लोगों तक पहुंचे और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं. (REUTERS)