एग्रीवेट: 05 अक्टूबर 2026, गया (बिहार): गया के अजय कुमार मेहता: एक तालाब से मछली भी, मोती भी – बिहार के गया जिले के मानपुर प्रखंड स्थित बरेऊं गांव में अजय कुमार मेहता ने डेढ़ एकड़ के एक तालाब से दोहरी कमाई का तरीका निकाला है। वे इसी तालाब में मछली पालन के साथ सीप पालन भी करते हैं, और सीप से मोती तैयार करके अतिरिक्त आय जोड़ रहे हैं।
“मेरे पास मात्र डेढ़ एकड़ जमीन है, उसी में तालाब के माध्यम से सीप पालन कर रहे हैं,” अजय बताते हैं। सरकारी योजनाओं के आने से पहले ही उन्होंने यह काम शुरू कर दिया था, और अब उनका अनुभव राज्य सरकार की सीप पालन पायलट परियोजना में भी काम आ रहा है, जहां वे मास्टर फार्मर के तौर पर दूसरे किसानों को प्रशिक्षण देते हैं।
मोती बनाने की प्रक्रिया लंबी और सावधानी भरी है। सीपों को पहले 15 दिन से एक महीने तक क्वारंटाइन में रखा जाता है, ताकि वे नए वातावरण के अनुकूल हो सकें। इसके बाद सर्जरी करके उनके भीतर न्यूक्लियस डाला जाता है।
“ये सीप के अंदर प्याज की तरह लेयर बाई लेयर चढ़ता रहता है,” अजय इस प्रक्रिया को समझाते हैं। सर्जरी के बाद सीपों को 100 लीटर के ऑक्सीजन-युक्त टैंक में 24 घंटे रखा जाता है, ताकि वे सर्जरी के झटके से उबर सकें।
“मानव हो या पशु, सभी को ऑपरेशन के बाद विशेष ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है,” वे कहते हैं। इसके बाद सीपों को प्लास्टिक की टोकरियों में तालाब के भीतर रखा जाता है, जहां मोती तैयार होने में 8 से 24 महीने तक का समय लगता है। इस दौरान पानी की गुणवत्ता और तालाब का तापमान दोनों पर बराबर ध्यान रखना पड़ता है।
2,000 सीपों की एक इकाई लगाने में करीब 2 लाख 84 हजार 800 रुपये की लागत आती है, जिस पर सरकार 50 प्रतिशत सब्सिडी देती है। अजय के मुताबिक एक तालाब से शुरुआती दौर में 5 से 6 लाख रुपये तक की संभावित वार्षिक आय हो सकती है।
स्थानीय बाजार में एक मोती 400 से 2,000 रुपये तक बिकता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह कीमत 2,000 से 5,000 रुपये या इससे अधिक तक पहुंच जाती है। अजय के अनुसार अगर कोई किसान एक साथ 10 से 15 इकाइयां लगाए तो आय का आंकड़ा और भी ऊपर जा सकता है।
अजय बताते हैं कि उनके एक तालाब से मछली बिक्री से ही सालाना करीब 7 लाख रुपये मिल जाते हैं, और अब मोती उत्पादन से 8 से 10 लाख रुपये की अतिरिक्त कमाई जुड़ने की उम्मीद है। इस कमाई से उन्होंने अपने एक बेटे को यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए भेजा है, जबकि दूसरे बेटे की उच्च शिक्षा भी इसी आय से चल रही है।
गया जैसे इलाके में, जहां पारंपरिक रूप से सिर्फ मछली पालन होता रहा है, सीप और मोती को जोड़ना किसानों के लिए एक नया विकल्प बनकर सामने आया है। मोती की खेती में एक बड़ा फायदा यह है कि वही तालाब और वही पानी, जो मछली पालन के लिए पहले से इस्तेमाल हो रहा है, सीप पालन के लिए भी काम आ जाता है, जिससे किसान को अलग से जमीन या ढांचा खड़ा करने की जरूरत नहीं पड़ती।
राज्य सरकार की पायलट परियोजना के तहत अब दूसरे जिलों के किसानों को भी इस तकनीक से जोड़ने की कोशिश हो रही है। मास्टर फार्मर के तौर पर अजय जैसे अनुभवी किसानों की भूमिका इसमें अहम मानी जा रही है, क्योंकि सीप की सर्जरी और देखभाल जैसे बारीक काम व्यावहारिक प्रशिक्षण के बिना सीखना मुश्किल होता है। अजय का कहना है कि जो भी किसान धैर्य के साथ यह काम सीखना चाहे, वह मछली पालन के साथ-साथ इसे आसानी से शुरू कर सकता है।