एग्रीवेट: Cattle Health: बरसात का मौसम पशुओं के लिए कई तरह की स्वास्थ्य चुनौतियां लेकर आता है. लगातार बारिश, अधिक नमी और पशुशाला में कीचड़ जमा होने से गाय, बैल और बछड़ों में परजीवी संक्रमण तेजी से फैल सकता है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार इस मौसम में फीता कृमि (Tapeworm) का संक्रमण सबसे अधिक देखने को मिलता है, जो पशुओं की वृद्धि, दूध उत्पादन और संपूर्ण स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है. यदि समय पर पहचान और उपचार न किया जाए तो बछड़ों की स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार बरसात में गीली जमीन, दूषित चारा और गंदे वातावरण में बंधे रहने वाले पशुओं में परजीवी तेजी से पनपते हैं. संक्रमित घास या पानी के माध्यम से फीता कृमि पशु के शरीर में प्रवेश कर जाता है और आंतों में विकसित होकर पोषक तत्वों को सोखने लगता है. यही कारण है कि खुले या अस्वच्छ स्थानों पर रखे गए पशुओं में संक्रमण का जोखिम काफी बढ़ जाता है. फीता कृमि का संक्रमण धीरे-धीरे पशु को कमजोर बना देता है. इसके कारण दस्त, भूख कम लगना, शरीर का वजन घटना और दूध उत्पादन में गिरावट जैसी समस्याएं सामने आती हैं. कई बार पशुओं की त्वचा बेजान दिखाई देती है और उनकी सामान्य कार्यक्षमता भी प्रभावित हो जाती है. लंबे समय तक संक्रमण बने रहने पर शरीर में पोषण की कमी बढ़ जाती है, जिससे पशु जल्दी थकने लगता है. कुंवर घनश्याम बताते हैं कि फीता कृमि का सबसे ज्यादा प्रभाव छह महीने तक की उम्र वाले बछड़ों पर पड़ता है. संक्रमित बछड़ों का विकास धीमा हो सकता है, वे लगातार कमजोर दिखाई देते हैं और बार-बार दस्त की शिकायत रहती है. कुछ मामलों में पेट या गले में असामान्य सूजन भी देखने को मिलती है. यदि संक्रमण गंभीर हो जाए और इलाज में देरी हो, तो बछड़ों के जीवन पर भी खतरा उत्पन्न हो सकता है. बरसात के मौसम में पशुशाला की नियमित सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए. पशुओं को कीचड़ या पानी जमा होने वाली जगह पर न बांधें तथा खाने और पानी के बर्तनों को रोज साफ करें. दूषित घास या सड़ा हुआ चारा बिल्कुल न खिलाएं और चारे को सूखी जगह पर सुरक्षित रखें. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार वयस्क गायों को हर छह महीने में पशु चिकित्सक की सलाह से कृमिनाशक दवा दी जानी चाहिए. वहीं, छह महीने तक की उम्र वाले बछड़ों को आवश्यकता अनुसार हर महीने कृमिनाशन कराया जा सकता है. दवा की मात्रा हमेशा पशु की उम्र, वजन और स्वास्थ्य के आधार पर ही तय करनी चाहिए. बरसात में नियमित निगरानी, संतुलित आहार और समय पर उपचार अपनाकर परजीवी संक्रमण के खतरे को काफी हद तक रोका जा सकता है.