एग्रीवेट: जबलपुर जिले के सिहोरा विकासखंड के ग्राम गांधीग्राम के किसान शनि चौरसिया ने फसल विविधीकरण और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर खेती में नया प्रयोग किया है. मक्का की खेती से अपेक्षा के अनुरूप लाभ नहीं मिलने के बाद उन्होंने करीब तीन वर्ष पहले मक्का के स्थान पर तिल की खेती करने का फैसला लिया. राष्ट्रीय मिशन ऑन एडिबल ऑयल मिशन के अंतर्गत उन्होंने ढाई एकड़ क्षेत्र में तिल की उन्नत किस्म जीटी-7 की बुवाई की. कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर उन्होंने तिल की अच्छी फसल तैयार की और अब इस वैकल्पिक फसल को खेती का उपयोगी विकल्प मान रहे हैं.
गांधीग्राम क्षेत्र में सामान्य तौर पर धान की खेती प्रमुख रूप से की जाती है. वहीं किसान शनि चौरसिया अपनी एक तरफा ढलान वाली कृषि भूमि में मक्का की फसल लेते थे. हालांकि मक्का से उन्हें अपेक्षा के अनुसार आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा था. ऐसे में उन्होंने परंपरागत फसल के बजाय क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप किसी दूसरी फसल को आजमाने का बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया .
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करीब तीन वर्ष पहले उन्होंने किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग द्वारा संचालित राष्ट्रीय मिशन ऑन एडिबल ऑयल मिशन के तहत ढाई एकड़ भूमि में तिल की उन्नत किस्म जीटी-7 की बुवाई की.यह उनके लिए एक नई शुरुआत थी, क्योंकि इससे पहले इसी भूमि पर मक्का की खेती की जाती थी.
तिल की बुवाई से लेकर फसल की वृद्धि और कटाई तक कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसान को लगातार तकनीकी मार्गदर्शन दिया.खेत में पौधों की उचित दूरी बनाए रखने, खरपतवार नियंत्रण, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन तथा कीट एवं रोगों की नियमित निगरानी जैसे महत्वपूर्ण कृषि कार्यों की जानकारी दी गई.
किसान शनि चौरसिया ने भी कृषि अधिकारियों की सलाह को अपनाते हुए समय-समय पर आवश्यक कृषि कार्य किए. वैज्ञानिक पद्धति से फसल प्रबंधन किए जाने का असर फसल की स्थिति पर दिखाई दिया और खेत में तिल की फसल अच्छी स्थिति में विकसित हुई. इससे किसान का नई फसल को लेकर विश्वास और मजबूत हुआ.
जीटी-7 तिल की फसल का अनुभव किसान के लिए इसलिए महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि जिस क्षेत्र में पहले मक्का की खेती होती थी, उसी भूमि पर तिल जैसी वैकल्पिक फसल लेकर उन्होंने खेती का नया विकल्प तैयार किया.
किसान शनि चौरसिया के अनुसार, तिल की जीटी-7 किस्म की खेती में पानी की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम रहती है. कम मात्रा में बीज का उपयोग करके भी अच्छी फसल प्राप्त होने का उनका अनुभव रहा है. इससे खेती की लागत और आमदनी के बीच बेहतर संतुलन बनाने में उन्हें मदद मिली.
शनि चौरसिया बताते हैं कि तिल की फसल के बाद वे उसी खेत में गेहूं की खेती कर रहे हैं और इसके बाद उड़द की फसल भी लेते हैं.इस तरह फसल चक्र अपनाकर वे एक ही कृषि भूमि से अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलों का उत्पादन कर रहे हैं.
शनि चौरसिया का अनुभव बताता है कि किसी एक परंपरागत फसल पर निर्भर रहने के बजाय किसान अपनी भूमि, पानी की उपलब्धता और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फसल विविधीकरण अपना सकते हैं. नई फसलों और उन्नत किस्मों के साथ वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाने से खेती में नए विकल्प तैयार किए जा सकते हैं.
मक्का से तिल की ओर बढ़े शनि चौरसिया का यह प्रयोग अब उनके लिए खेती में बदलाव का जरिया बन गया है. उनका मानना है कि कृषि विशेषज्ञों की सलाह और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी खेती को अधिक व्यवस्थित और लाभकारी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.