एग्रीवेट: दिल्ली-NCR में एक बार फिर प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा है. सर्दियों की दस्तक के साथ राजधानी की हवा जहरीली होती जा रही है. वहीं, दिल्ली से 400 किलोमीटर से ज्यादा दूर पंजाब के खेतों में धान की पराली जलाने का सिलसिला भी तेज हो गया है. हर साल की तरह इस बार भी पराली का धुआं, किसानों की मजबूरी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चर्चा के केंद्र में हैं.
पंजाब के तरनतारन, फिरोजपुर, मोगा और संगरूर समेत कई जिलों में खेतों में आग की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. सैटेलाइट डेटा और जमीनी रिपोर्टों के मुताबिक, 2 नवंबर तक पंजाब में पराली जलाने की 1,612 घटनाएं दर्ज की गईं.
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इनमें सबसे ज्यादा 489 घटनाएं तरनतारन में सामने आई हैं. यानी राज्य में दर्ज कुल घटनाओं का करीब एक-तिहाई हिस्सा अकेले इसी जिले से है. फिरोजपुर में 193 और संगरूर में 76 मामले दर्ज किए गए हैं. मालवा क्षेत्र में धान की कटाई आगे बढ़ने के साथ मोगा समेत दूसरे जिलों में भी आग की घटनाएं बढ़ रही हैं.
पंजाब में पराली जलने की घटनाओं के बीच दिल्ली की हवा की क्वालिटी भी चिंता बढ़ा रही है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली का औसत AQI 331 यानी बहुत खराब श्रेणी में पहुंच गया. नोएडा में AQI 310 दर्ज किया गया.
दिल्ली के कई इलाकों में स्थिति और खराब रही. रोहिणी में AQI 427, पंजाबी बाग में 425 और मुंडका में 396 दर्ज किया गया. ऐसे में पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है.
प्रदूषण की समस्या सिर्फ भारतीय पंजाब तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट में दिए गए सैटेलाइट आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में भी करीब 13,241 आग की घटनाओं का पता चला. इनमें लगभग 92 फीसदी घटनाएं कृषि भूमि से जुड़ी बताई गई हैं.
लाहौर के आसपास ओकारा, गुजरांवाला और ननकाना साहिब जैसे जिलों में आग के हॉटस्पॉट सामने आए हैं.
पराली जलाने के बढ़ते मामलों के बीच किसानों का कहना है कि वे जानबूझकर खेतों में आग नहीं लगाते, बल्कि कई बार उनके सामने दूसरा विकल्प नहीं बचता. धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच समय बहुत कम होता है. छोटे और सीमांत किसानों के पास पराली प्रबंधन की मशीनें खरीदने या किराये पर लेने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते.
तरनतारन के चब्बल इलाके के किसान तरमिंदर सिंह का कहना है कि किसानों को पराली प्रबंधन के लिए आर्थिक मदद, बिजली और मशीनों पर सब्सिडी दी जानी चाहिए. उनका मानना है कि प्रदूषण को लेकर होने वाली बहस को राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया है.
भारतीय किसान यूनियन (लक्खोवाल) के अध्यक्ष हरिंदर सिंह लक्खोवाल भी कहते हैं कि किसान पराली जलाना नहीं चाहते. उनके मुताबिक, छोटे और सीमांत किसान आर्थिक और तकनीकी संसाधनों की कमी के कारण ऐसा करने को मजबूर होते हैं.
दूसरी तरफ, पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) के वरिष्ठ पर्यावरण अधिकारी डॉ. राजीव गुप्ता के मुताबिक, 2 नवंबर तक पिछले साल पंजाब में पराली जलाने की 2,262 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि इस साल इसी तारीख तक यह आंकड़ा 1,612 है। यानी पिछले साल के मुकाबले 650 घटनाएं कम हैं.
उनका कहना है कि सरकार और विभाग की कोशिशों का असर दिख रहा है और टीमें लगातार खेतों में सक्रिय हैं. हालांकि, मौजूदा सीजन में घटनाओं में हालिया तेजी प्रशासन के सामने चुनौती बनी हुई है.
लंबी अवधि के आंकड़े भी गिरावट दिखाते हैं. CAQM के मुताबिक, 2021 में पंजाब में 71,304 खेतों में आग की घटनाएं दर्ज हुई थीं, जो 2025 में घटकर 5,114 रह गईं. यानी करीब 93 फीसदी की कमी.
पराली जलाने के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं.
बीजेपी नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में राज्य सरकार और पुलिस के अधिकारी किसानों को रोकने के बजाय उन्हें ऐसा करने दे रहे हैं. उन्होंने आम आदमी पार्टी पर दोहरा रवैया अपनाने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि .
बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर ने कहा कि केंद्र सरकार ने पंजाब और हरियाणा दोनों को पराली जलाने की घटनाएं कम करने में मदद दी है और आम आदमी पार्टी अपनी जिम्मेदारी से बच रही है.
वहीं, आम आदमी पार्टी के मीडिया प्रभारी बलतेज पन्नू ने बीजेपी के आरोपों को पंजाब को बदनाम करने की कोशिश बताया. उनका कहना है कि दिल्ली के प्रदूषण के लिए केवल पंजाब के किसानों को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है. उन्होंने पराली प्रबंधन पर पंजाब सरकार की ओर से 800 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का भी दावा किया.
हरियाणा के मुख्यमंत्री ने भी इस मुद्दे पर पंजाब के नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि पराली जलाने की घटनाएं कम करने के लिए हरियाणा में काम हुआ है.
हर साल धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच किसानों को बहुत कम समय मिलता है. ऐसे में पराली को खेत से हटाना छोटे और सीमांत किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. मशीनों की कमी, उनके इस्तेमाल का खर्च और पराली के वैकल्पिक उपयोग की सीमित व्यवस्था इस समस्या को और बढ़ाती है.