एग्रीवेट: महाराष्ट्र के लातूर जिले में 12 किसानों ने मिलकर खेती करने का ऐसा तरीका अपनाया है, जिससे उनकी लागत कम हुई और खेती से होने वाला मुनाफा बचाने में मदद मिली. सूखे की आशंका, मजदूरों की बढ़ती मजदूरी और कर्ज के बोझ के बीच इन किसानों ने सामूहिक खेती को अपनी ताकत बनाया है. केकेत-सिंदगी गांव के इन किसानों ने मिलकर इस सीजन में सोयाबीन की कटाई पर करीब 2.3 लाख रुपये बचाए हैं. इतना ही नहीं, इस साल उन्हें खेती के लिए साहूकारों से कर्ज भी नहीं लेना पड़ा.
महाराष्ट्र के लातूर जिले के जलकोट तालुका के केकेत-सिंदगी गांव के 12 किसानों ने छत्रपति शिवाजी महाराज किसान समूह बनाया है. इस समूह का मकसद खेती का खर्च कम करना और मिलकर काम करके बेहतर नतीजे हासिल करना है. शुरुआत में इन किसानों ने अपनी-अपनी दो एकड़ जमीन पर मिलकर खेती का काम शुरू किया. इस तरह कुल 24 एकड़ जमीन पर सामूहिक रूप से खेती की गई. बाद में इन किसानों ने 30 एकड़ और जमीन पर मिलकर खेती का काम बढ़ाया. अब समूह के किसान कुल 54 एकड़ जमीन पर सामूहिक तरीके से खेती से जुड़े काम कर रहे हैं.
इस तरीके में किसान एक-दूसरे के खेतों में काम करते हैं और खेती के जरूरी कामों को मिलकर पूरा करते हैं. इससे अलग-अलग मजदूरों को बुलाने और मशीनों का इस्तेमाल करने पर होने वाला खर्च कम होता है.
इस समूह के किसान सुधाकर गोंड ने पीटीआई को बताया कि इस साल 54 एकड़ जमीन पर सोयाबीन की कटाई मिलकर करने से करीब 2.3 लाख रुपये की मजदूरी बची है. इसके साथ ही उत्पादन में भी करीब दो क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने बताया कि समूह में मिलकर काम करने से किसानों को काफी संतुष्टि मिलती है. सबसे बड़ी बात यह है कि इस साल किसी भी किसान को खेती का खर्च पूरा करने के लिए साहूकार से कर्ज नहीं लेना पड़ा. इससे खेती से होने वाली कमाई का ज्यादा हिस्सा किसानों के पास ही बचा रहा.
दरअसल, खेती में बीज, खाद, जुताई, बुवाई, मजदूरी और कटाई पर काफी पैसा खर्च होता है. जब हर किसान अलग-अलग इन कामों के लिए मजदूर और मशीनें लगाता है, तो लागत बढ़ जाती है. लेकिन सामूहिक खेती में किसान अपने संसाधनों और मेहनत को साझा करते हैं, जिससे खर्च कम करने में मदद मिलती है.
इन किसानों ने सोयाबीन की कटाई के लिए एक पारंपरिक तरीका अपनाया है. इसमें किसान एक-दूसरे के खेतों में जाकर फसल काटने में मदद करते हैं. इस तरह हर किसान को अपने खेत में कटाई के लिए अलग से मजदूरों को बुलाने की जरूरत कम पड़ती है. क्षेत्र में करीब सवा एकड़ जमीन पर सोयाबीन की कटाई के लिए लगभग 5,500 रुपये तक खर्च हो सकता है. ऐसे में 54 एकड़ जमीन पर कटाई के लिए मजदूरों पर होने वाला खर्च काफी बढ़ सकता है. किसानों ने मिलकर काम किया, जिससे इस खर्च को कम करने में मदद मिली.
समूह के किसान बीज खरीदने, खेत की जुताई करने और बुवाई जैसे काम भी मिलकर करते हैं. वे अपने काम की योजना इस तरह बनाते हैं कि एक किसान का काम पूरा होने के बाद दूसरे किसान के खेत में काम किया जा सके. इससे मजदूरों और मशीनों का बेहतर इस्तेमाल होता है.
सामूहिक खेती का फायदा केवल कटाई तक सीमित नहीं है. किसान बीज और खेती में इस्तेमाल होने वाली दूसरी जरूरी चीजें भी मिलकर खरीदते हैं. जब कई किसान एक साथ सामान खरीदते हैं, तो उन्हें बेहतर कीमत पर सामान मिलने की संभावना बढ़ जाती है. इसी तरह किसान ट्रैक्टर से जुताई और दूसरे कामों के लिए भी मिलकर बातचीत करते हैं. एक साथ कई खेतों में काम तय होने से ट्रैक्टर संचालकों से बेहतर दर पर काम कराने में मदद मिलती है. इससे मशीनों का इस्तेमाल भी ज्यादा व्यवस्थित तरीके से हो पाता है.
किसानों का कहना है कि इस तरह खेती के अलग-अलग कामों को मिलकर करने से खर्च कम होता है और काम समय पर पूरा करने में मदद मिलती है.
इन किसानों ने सामूहिक खेती का तरीका पानी फाउंडेशन के प्रशिक्षण और वीडियो से सीखा. सुधाकर गोंड ने इसके फायदे समझने के बाद गांव के दूसरे किसानों को भी इस तरीके को अपनाने के लिए प्रेरित किया. इसके बाद समूह के किसानों ने नांदेड़ जिले के सगरोली में प्रशिक्षण लिया और सीखी गई तकनीकों को अपने खेतों में अपनाना शुरू किया. धीरे-धीरे किसानों ने खेती के कामों को मिलकर करने की आदत विकसित की.
इस पहल से किसानों को यह समझने में मदद मिली कि खेती में केवल ज्यादा उत्पादन करना ही जरूरी नहीं है, बल्कि खर्च कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अगर लागत कम होती है और उत्पादन बेहतर रहता है, तो किसानों की बचत बढ़ सकती है.
सामूहिक काम के साथ किसान खेती के वैज्ञानिक तरीकों को भी अपना रहे हैं. कृषि विभाग और पानी फाउंडेशन के मार्गदर्शन में वे बीज उपचार, सही किस्मों का चुनाव और खेत तैयार करने के बेहतर तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. बीज उपचार का मतलब बुवाई से पहले बीज को इस तरह तैयार करना है, जिससे फसल को शुरुआती दौर में बीमारियों और दूसरे नुकसान से बचाने में मदद मिल सके. सही किस्म का चुनाव करने से भी स्थानीय मौसम और जमीन के हिसाब से बेहतर उत्पादन पाने की संभावना बढ़ती है.
किसान चौड़ी क्यारियों और उनके बीच नालियां बनाने वाली ब्रॉड बेड एंड फरो (BBF) विधि से भी बुवाई कर रहे हैं. इस तरीके में खेत को ऊंची क्यारियों और नालियों के रूप में तैयार किया जाता है. इससे पानी के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सकती है. इसके अलावा किसान प्राकृतिक तरीके से कीटों को नियंत्रित करने पर भी ध्यान दे रहे हैं. वे स्थानीय पत्तियों और गोबर की मदद से दशपर्णी अर्क तैयार करते हैं, जिसका इस्तेमाल खेती में प्राकृतिक कीट प्रबंधन के लिए किया जाता है.
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में बारिश की कमी के कारण खेती पर असर पड़ने की आशंका बनी रहती है. ऐसे हालात में फसलों को बचाने के लिए पानी का सही इस्तेमाल बेहद जरूरी हो जाता है. केकेत-सिंदगी के किसान पानी की कमी होने पर भी एक-दूसरे की मदद करते हैं. समूह के सदस्य उपलब्ध पानी को साझा करने की व्यवस्था करते हैं, ताकि जरूरत के समय खड़ी फसलों को बचाने में मदद मिल सके.
सामूहिक खेती का यह तरीका किसानों के बीच सहयोग को भी बढ़ाता है. जब किसी किसान के सामने मुश्किल आती है, तो समूह के दूसरे सदस्य उसके साथ खड़े होते हैं. इससे खेती का जोखिम अकेले उठाने के बजाय मिलकर उसका सामना करने में मदद मिलती है.
किसान समूह के सदस्य हर रविवार को बैठक करते हैं. बुवाई का मौसम शुरू होने से पहले भी वे मिलकर चर्चा करते हैं कि कौन-सी फसल उगानी है और खेती के अलग-अलग काम कैसे पूरे किए जाएंगे. समूह के किसान सोयाबीन, अरहर और कपास जैसी फसलें उगाते हैं. बैठक में फसल के चुनाव, बीज खरीदने, खेत तैयार करने और दूसरे जरूरी कामों को लेकर योजना बनाई जाती है. इससे किसानों को समय पर काम पूरा करने और संसाधनों का सही इस्तेमाल करने में मदद मिलती है.
कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) के तालुका टेक्नोलॉजी मैनेजर अभिलाष क्षीरसागर ने कहा कि सामूहिक खेती को केवल पानी फाउंडेशन की प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रखना चाहिए. किसानों को रबी सीजन और आने वाले वर्षों में भी इस तरीके को जारी रखना होगा. तभी इसके लंबे समय तक फायदे मिल सकेंगे. सहायक कृषि अधिकारी प्रदीप रेड्डेवाड के अनुसार, सामूहिक खेती से किसान मिलकर काम कर सकते हैं और खेती की लागत कम कर सकते हैं. इससे सूखे जैसी चुनौतियों का सामना करने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है.
वहीं, पानी फाउंडेशन के फील्ड ऑफिसर ओम कुर्डे ने बताया कि लातूर जिले के जलकोट, अहमदपुर, देवनी, चाकुर और उदगीर क्षेत्रों में कृषि विभाग, ATMA और UMED मिशन के सहयोग से सामूहिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. उन्होंने केकेत-सिंदगी के किसान समूह को इस प्रयास का अच्छा उदाहरण बताया.
लातूर के इन 12 किसानों की पहल बताती है कि खेती में एक-दूसरे का सहयोग करने से लागत कम करने और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है. मजदूरों की बढ़ती मजदूरी, महंगे कृषि उपकरण और कर्ज जैसी समस्याओं के बीच किसान मिलकर काम करके अपनी परेशानी कम कर सकते हैं. हालांकि, इस मॉडल का लंबे समय तक सफल रहना इस बात पर निर्भर करेगा कि किसान आने वाले रबी सीजन और अगले वर्षों में भी मिलकर काम करना जारी रखते हैं या नहीं. अगर यह व्यवस्था लगातार चलती है, तो दूसरे गांवों के किसान भी इससे सीख ले सकते हैं.
सूखे की आशंका के बीच लातूर के इन किसानों ने दिखाया है कि खेती में केवल जमीन और संसाधन ही नहीं, बल्कि आपसी सहयोग, सही योजना और वैज्ञानिक तरीके भी महत्वपूर्ण हैं. मिलकर खेती करने से किसानों को खर्च घटाने, कर्ज से बचने और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बचाने में मदद मिल सकती है. (PTI)
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