एग्रीवेट: जब भी चावल की बात होती है, तो सबसे पहले बासमती का नाम आता है. लेकिन उत्तराखंड का लाल चावल भी अपनी खास पहचान बना रहा है. स्वाद और पोषण के साथ इसकी अलग पहचान है. 2023 में इसे जीआई टैग मिलने के बाद उत्तराखंड के बाहर भी इसकी मांग बढ़ी है. ऐसे लाल चावल की खेती उत्तरकाशी जिले में होती है. अब धीरे-धीरे यह देश-दुनिया के बाजारों में अपनी पहचान बना रहा है.
चारधाम यात्रा और प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर उत्तरकाशी की कृषि विरासत में इस चावल की खास जगह है. ऐसे राज्य सरकार ने लाल चावल को ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) योजना के तहत उत्तरकाशी का प्रमुख उत्पाद चुना है. इससे किसानों और इस पारंपरिक चावल को बाजार में नई पहचान मिल रही है. इसे चावल में जिंक, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं.
उत्तरकाशी के पुरोला, मोरी, नौगांव और रवांई घाटी में पारंपरिक रूप से लाल चावल की खेती की जाती है. अब इसे वैज्ञानिक तरीके से बढ़ावा देने के साथ व्यावसायिक खेती के रूप में विकसित किया जा रहा है. पहले लाल चावल की खेती मुख्य रूप से पुरोला और रवांई घाटी के कुछ सीमित इलाकों तक ही होती थी. अब इसे भटवाड़ी, डुंडा और चिन्यालीसौड़ ब्लॉक के गंगा घाटी वाले क्षेत्रों में भी क्लस्टर बनाकर उगाया जा रहा है. इससे लाल धान की खेती का दायरा बढ़ने और किसानों को बाजार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. वहीं, कृषि और उद्यान विभाग की टीमें लाल चावल की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को मुफ्त में उन्नत बीज और जैविक खाद देती हैं. किसानों को कीटों से फसल बचाने के तरीके भी बताए जाते हैं.
लाल चावल में एंथोसायनिन नाम का प्राकृतिक पिगमेंट पाया जाता है. इसके चलते यह लाल रंग का होता है. किसान आमतौर पर इसकी खेती पारंपरिक तरीकों से करते हैं. इसलिए इसे तकनीकी रूप से जैविक चावल नहीं कहा जा सकता. हालांकि, लाल चावल में आयरन, एंटीऑक्सीडेंट और फाइबर जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. ऐसे लाल चावल का स्वाद हल्का नट जैसा होता है और इसकी बनावट थोड़ी चबाने वाली होती है. यही वजह है कि यह स्थानीय लोगों के साथ पर्यटकों के बीच भी पसंद किया जाता है.
लाल चावल की खेती मुख्य रूप से खरीफ यानी मॉनसून सीजन में की जाती है. इसकी खेती सामान्य धान की तरह ही होती है. जून-जुलाई में इसकी नर्सरी तैयार की जाती है और जुलाई-अगस्त में खेतों में पौधों की रोपाई की जाती है. हालांकि,अक्टूबर- नवंबर तक फसल पककर तैयार हो जाती है. इसके बाद किसान इसकी कटाई करते हैं.
लाल चावल का सालाना उत्पादन करीब 1,500 टन होता है. हालांकि, राज्य में इसकी खेती का कोई एक आधिकारिक और हर साल जारी होने वाला आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. पहाड़ी इलाकों में किसान इसे अलग-अलग क्षेत्रों में क्लस्टर बनाकर और व्यक्तिगत स्तर पर उगाते हैं. उदाहरण के लिए, चंपावत की लधियाघाटी के कुछ इलाकों में ही लाल चावल की खेती 300 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में की जा रही है. इसका रेट 150 रुपये किलो तक होता है.